टाटु गोञ की गौरवगाथा*
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*सती माता राजोबाई और बालाबाई : टाटु गोत्र की* गौरवगाथा
(साभार : विठ्ठलसिंह काकरवाल)
भूमिका
भारतीय इतिहास में सती परम्परा को विशेष सम्मान प्राप्त है। सती वीरांगनाएँ न केवल अपने पतिव्रता धर्म का पालन करती थीं, बल्कि समाज के आदर्श बनकर पूजी जाती थीं। टाटु गोत्र से सम्बन्ध रखने वाली सती माता राजोबाई और सती माता बालाबाई इस गौरवशाली परम्परा की अमर प्रतीक हैं, जिनकी स्मृति आज भी समाज में श्रद्धा और सम्मान से जीवित है।
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*वंश परम्परा और गोत्र सम्बन्ध*
टाटु गोत्र का सम्बन्ध गहेलोत वंश से माना जाता है। दोनों को एक ही वंश परम्परा का विस्तार समझा जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से गहेलोत वंश राजस्थान के प्रमुख क्षत्रिय वंशों में से एक रहा है।
टाटु गोत्र की प्रमुख कुलदेवी लंकेश्वर माता हैं, तथा कुलदैवत के रूप में नसिर की पूजा की जाती है।
टाटु गोत्र के दो प्रमुख थाने — एक चित्तौड़गढ़ के आसपास, दूसरा चंदेलगढ़ के क्षेत्र में स्थित माने जाते हैं।
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*सती माता राजोबाई की कथा*
सती माता राजोबाई भोजा टाटु की भार्या थीं। उनका जन्म देवचंद महेर की पुत्री के रूप में हुआ था।
विवाह के बाद, राजोबाई ने अपने पति भोजा टाटु के साथ कर्तव्य, धर्म और प्रेम का निर्वाह किया। सन 1397 ईस्वी में, पति के देहावसान के उपरांत, राजोबाई ने पति की चिता के साथ स्वयं भी सती होने का निर्णय लिया।
उनका यह बलिदान नारी धर्म, पतिव्रता आस्था और साहस का अनूठा उदाहरण बन गया।
आज भी सती माता राजोबाई का स्थान अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ पूजा जाता है।
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*सती माता बालाबाई की कथा*
सती माता बालाबाई सुंदर दास टाटु की भार्या थीं।
बालाबाई, सावड्या पटेल की पुत्री थीं। पति की मृत्यु के उपरांत, सन 1503 ईस्वी में, उन्होंने भी सती होकर अमरत्व प्राप्त किया।
उनकी आस्था, त्याग और धर्मपरायणता ने उन्हें भी अमर सती के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
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*ऐतिहासिक प्रमाण*
भिमसेन जागा द्वारा लिखित पोथी, जो ननावद गाँव (तहसील व जिला श्योपुर, मध्य प्रदेश) में सुरक्षित है, में इन दोनों सती माताओं के उल्लेख मिलते हैं।
यह पोथी साक्ष्य देती है कि टाटु गोत्र के लोग अपने कुल और धर्म के प्रति कितने निष्ठावान थे, और कैसे उनकी वीरांगनाओं ने अपने जीवन से आदर्श स्थापित किए।
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निष्कर्ष
सती माता राजोबाई और बालाबाई केवल व्यक्तिगत नारी धर्म का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे पूरे टाटु गोत्र और गहेलोत वंश की अस्मिता, सम्मान और धर्मनिष्ठा की जीवंत मूर्तियाँ हैं।
उनकी पूजा केवल एक परम्परा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना है जो हमें अपने कर्तव्यों, मूल्यों और त्याग की भावना की याद दिलाती है।
*जोहार सती माताओं को।*
*साभार : विठ्ठलसिंह काकरवाल*
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