बारवाल/गोठवाल मीणा माइक्रो हिस्ट्री

 बारवाल/गोठवाल मीणा माइक्रो हिस्ट्री 

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प्राचीन मत्स्य राजाओ के वंस में साह हुए वे गढ़ मोरां /मोरू-बोरवा से आकर वर्तमान सवाईमाधोपुर क्षेत्र में बसे | उनके दो पुत्र हुए | प्रथम पुत्र नींबू ने संवत् 999 में ''गोठ ''(तह० बामनवास,सवाईमाधोपुर) बसाई | और दुसरे पुत्र आबू ने अम्बावरा बसाया | नींबू के मेवासे गोठ से निकले ''गोठवाल'' और अम्बावरा-भांवरा (तह० बामनवास,सवाईमाधोपुर) से निकले बारवाल कहलाये | इन्होने कुलदेवी बिनजारी माता को माना |दंतकथा है की मारवाड़ से रास्ते में आते हुए बंजारों से झगड़ा हुआ उसमे एक बिन्जारा लडकी ने मीनों को बचाया इस कारण से बचे हुए मीनाओं ने उसे अपनी रक्षक और देवी अवतार माना और जहाँ बसे उसका स्थान बनाया | वर्तमान गोठ से 5 किलोमीटर दूर प्राचीन माता का थानक बनाया | जिसका भगत टुंडा गोठ गाँव से दुरी होने के कारण वाही बस गया और आज वो टुंडीला गाँव है वैसे अमावरा सहित 6-7 गाँवो माता के स्थान बन गए पर टुंडीला का थानंक सबसे प्राचीन है || कई पीढ़ी बाद अम्बावरा से जाकर छाजल (कालू) ने छारेड़ा बसाया | कई पीढ़ी बाद मदेफर का पुत्र मुरकल्या बारवाल मेवासी(प्रसिद्द मुखिया ) हुआ |प्रसिद्द समाज सुधारक मुनि मगन सागर उखलाना टोंक के गोठवाल ही थे | गोठवाल गोत्र में कुल चंद के 12 लडके हुए जिन्होंने 12 खेड़े बसाये | ऐसे ही महलग का पुत्र लाहाडो गोठवाल(गोठ -सिकरोड़ी, बामनवास ) भी प्रसिद्द मेवासी हुआ | गोठ ,सिकरोड़ी और भांवरा वर्तमान तह०बामनवास सवाईमाधोपुर,गाँव छारेड़ा तह०/जिला दौसा,मुंडिया तह०निवाई जिला टोंक प्राचीन गाँव है | आशापाला कुल वृक्ष को मानते है | इन गोत्रो के गाँव मुख्य रूप से सवाईमाधोपुर,दौसा,करोली और टोंक जिले की तहसीलों में है | | इस गोत्र के लोग राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रो में तो गए ही दुसरे प्रदेशो में भी जाकर बसे है उनमे उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश,और महाराष्ट्र का नाम लिया जा सकता है |गोठवाल गोत महाराष्ट्र मे नावरा तह.भडगाव हातले तह चालीसगाव पाचोरा मे भी है। कहते है राजपुताना से दक्षिण की लड़ाई में खड़की (औरंगाबाद), दौलताबाद गढ़ (देवगिरी) आने के बाद गाँव-नागद के पास के अंकाई किले पर गोठवाल भाईयो ने हाथी का बाजार भराया था । तब ये खबर दिल्ली तक पहुँच गई । ऊन भाईयो को पकड़ने के लिए दिल्ली और औरंगाबाद से कुछ सैनिक आये। लेकिन गोठवाल भाईयो ने चकमा देकर गिरणा नदी के किनारे छुप गये। जहां पर राजाओ के राज की सीमा बदल जाती थी । बाद मे नावरा मे ही बस गये।महाराष्ट्र गए गोठवाल गाँव नागद के पास अकाई किले पर ''हाथी बाजार '' भराया था यह घटना आदलवाडा के भोमिया हाथी बाबा के मेले से तो सम्बन्धित नहीं कही आदलवाडा के गोठवाल दौलताबाद की लड़ाई में गए हो| बारवाल चांडोल,जनुना तह.जि.बुलढाणा, गाँव -पळशी तह कन्नड जि औरंगाबाद गाँव-जंगीपुरा जि जलगाव महाराष्ट्र में बसे हुए है |इस जानकारी को विस्तार देने के लिए सभी का सहयोग चाहिए | इस गोत्र के गाँव और महत्वपूर्ण घटनाये शेयर करे |-पी एन बैफलावत (14-10-17)

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मीणा गोत के निम्न मीणा ओ की कुलदेवी 1 गोमलाडू मीणा 1 सनतया माता 2 बांकी माता 2 घुणावत मीणा 1 मोरा माता 2 लहकोड माता 3 काकरवाल मीणा 1 अम्बे माता 2 मोरा माता 4 उषारे मीणा 1 हिंगलाज माता 2 बीजासन माता 3 बांकी माता 5 लोदवाल मीणा 1 कैलाई माता 6 चेडवाल मीणा घटवासन माता 7 मेहर मीणा घटवासन माता 8 लकवाल मीणा घटवासन माता 9 आमट मीणा घटवासन माता 10 नकवाल मीणा घटवासन माता 11 बुजेटया मीणा घटवासन माता 12 मचिया मीणा अम्बे माता 13 सुसावत मीणा अम्बे माता 14 छाडवाल मीणा पपलाज माता 15 धणावत मीणा पपलाज माता 16 डूंगर जाल मीणा पपलाज माता 17 जूरावत मीणा पपलाज माता 18 गोठवाल मीणा बंजारी माता 19 बारवाल मीणा बंजारी माता 20 बडजावत मीणा बंजारी माता 21 मांदड मीणा बीजासणी माता 22 डाडरवाल मीणा बीजासणी माता 23 चांदा मीणा बाण अशावरी माता 24 नांढला बडगोती 1 अम्बा माता 2 आशावरी माता 25 सुलाणया सुलाने भगवासन माता 26 सौगण शेवगण मीणा बांकी माता 27 बयाडवाल मीणा बांकी माता 28 दुलोत मीणा बांकी माता 28 डूमाला मीणा बांकी माता 29 मांड्या मीणा बांकी माता 30 देबडवाल मीणा चांवड माता 31 नाई मीणा नारायणी माता 32 ककरोडा मीणा 1 चांमुडा माता 2 नारायणी माता 33 मेवाल मीणा 1 मैणसी माता 2 नारायणी माता 34 कोटवाल मीणा मोरा माता 35 चंदवाडा मीणा मोरा माता 36 धूरवाल मीणा लहकोड माता 37 कुवाल मीणा लहकोड माता 38 डेचरवाल मीणा चांमुडा माता 39 बमणावत मीणा बिलई माता 40 सिहरा मीणा दांत माता 41 सहेर मीणा गुमानो माता 42 टाटू मीणा बडासन लंकेश्वरी माता 43 राजरवाल मीणा चांवड माता 44 लालसोटया मीणा चांवड माता 45 लोटन मीणा चांवड माता 46 डांगर मीणा चांवड माता 47 खोडा मीणा सेवड माता 48 देवाना मीणा चांवड मीणा 49 कालोत मीणा बांकी माता 50 मुराडया मीणा खोरी माता

महाराष्ट्र महाराष्ट्र परदेशी राजपूत (राजस्थान के मीना (मीणा) ) महाराष्ट्र में भी परदेशी,राजपूत, नाम से राजस्थान से करीब 400 साल पहले 1600-1700 ई० के बीच राजा मानसिंह, महासिंह, भावसिंह और जयसिंह से साथ सेनिको के रूप में दक्षिण के खानदेश, अहमद नगर, बीजापुर, और गोलकुंडा विजय करने गए जयपुर के राजाओ को वहा की सुबेदारी मिलने पर लम्बे समय रहने के गए सेनिक व सहयोगी वही बस गए जय सिंह के देहांत के बाद मुग़ल सूबेदारों ने आर्थिक संकट के कारन सेना कम कर दी उन सेनिको को शिवाजी मराठा ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए वो ही मीणा लोग परदेशी राजपूत है | महाराष्ट्र में बसे परदेशी राजपूत (मीना) वहां आपस में कावच्या, भातरया,और सपाटया नाम से एक दुसरे को संबोधित करते है | संयोगवश यह नाम राजस्थान में भी प्रचलित है | जब यहाँ के मीना महाराष्ट्र में गए तब आज का पचवारा,नागरचाल, खैराड,तलेटी, बवान्नी, बयालिसी, के क्षेत्र को कवाच्या कहते थे इसलिए महाराष्ट्र में कवाच्या शब्द का प्रयोग हुवा | मेवात (अलवर-भरतपुर), डूंगरवाड, काठेड (नरौली बैर भरतपुर),जगरोटी (हिंडौन करोली), आंतरी,नेहडा (अलवर), डांग (करोली धोलपुर ) इस क्षेत्र को 350-400 वर्ष पूर्व भातर प्रदेश कहते थे जिसकी राजधानी माचाड़ी थी राजस्थान के भातर प्रदेश निकले मीना माहाराष्ट्र में भातरया, बहदुरिया (करोली की प्राचीन राजधानी बहादुरपुर थी ), बहतारिया, कहलाते है | सपाट (सपाड) प्रदेश से गए हुए राजस्थान के मीना लोगो को मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में सापडया (सपाट्या) कहते है | खंडार तहसील का क्षेत्र,श्योपुर का क्षेत्र, चम्बल, और पार्वती नदी के बीच का क्षेत्र और समस्त हाड़ोती(कोटा,बारां,झालावाड) सापडया क्षेत्र कहलाता था | ये लोग महाराष्ट्र के 15 जिलों की 35 तहसीलों के लगभग 325 गाँवो में रहते है | हम इनका इतिहास ढूंढ रहे है कुछ दस्तावेज भी मिल रहे ...राम सिंह नोरावत जी भी 1949 में वहा गए लोगो से मिले जिसका विवरण अपनी डायरी में लिखा और उस समय की मीणा वीर पत्रिका में छपवाया ओरंगाबाद में मीणा खोखड़ सरदार रामो जी खोखड़ के युध्द में शहीद होने पर उनके नाम से गाँव बसा हुवा है जो औरंगाबाद की एक कोलोनी बन चूका .|.खंडिप गंगापुर के उदय सिंह लकवाल वैजापुर /बीजापुर के युद्ध में वीरगति पाई थी जागा उनके परिवार का महाराष्ट्र से संवत 1730 में आना बताते है जिनको उस गाँव में आज भी मराठा थोक कहते है | कुरहा (अमरावती,बरार ) महाराष्ट्र में एक प्राचीन पपलाज माता जी का बहुत बड़ा मंदिर है पास ही 4 किलोमीटर दूर तिउसा गाँव में एक प्रसिद्ध ताजी गोत्र का मीना परिवार के लोग रहते है जिसमे नारायण सिंह ताजी ख्याति प्राप्त रहे है उनके वन्सजो का निकास भगवतगढ सवाई माधोपुर से होना बताते है करीब 300 साल पूर्व यहाँ से ले जाकर कुरहा में माता जी की स्थापना की गई है नारायण सिंह ताजी की शादी भी करीब 100 साल पहले जयपुर के किसी बड़दावत गोत्री मीणा के यहाँ हुई थी | विट्टल सिंह जी डाडरवाल और प्रताप सिंह जी पैडवाल अपनी वन्सवाली जानने डिगो लालसोट के जागाओ के पास 50 साल पहले आये थे | हम अपना वजूद भूले हुई समाज के लोगो को अपना वजूद जानने में सहयोग कर रहे है | हम 2004 से निरंतर उनके संपर्क में है | 6-2- 2013 व फ़रवरी 7-9 मार्च 2014 को हम महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले की गंगापुर तहसील के कुछ गाँवो में भी जाकर आये है पुराने लोगो का पहनावा,भाषा रीतिरिवाज सब अपने जैसे ही है उनको अपनी मूल भूमि से जोड़ने के लिए सभी का सहयोग अपेक्षित है | सभी के प्रयास से राजस्थान में महाराष्ट्र से अब तक 18 शादिया लालसोट, गंगापुर, निवाई, उनियारा, नैनवा, कोटा, बोंली, मालपुरा, जयपुर में हो चुकी है | किसी समय प्राचीन राजस्थान के अधिकांश हिस्से पर मीना राजाओ का अधिकार था आमेर उनमे प्राचीन था जो मं गणों का संघ था कच्छावा राजपूत नरवर प्रदेश मध्यदेश से जाकर आमेर धोखे से मिनाओ से छिना काफी लम्बे समय तक मीना संघर्ष करते रहे आखिर भारमल कछावा के अकबर की अधीनता स्वीकार करने और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के बाद उसकी शक्ति बढ़ गई थी तथा मीना पूर्णरूपेण अपनी शक्ति खो चुके थे फिर भी निरंतर संघर्ष जारी रखे हुए थे परन्तु इस मनोमालिन्य को पूरी तरह से मिटने के लिए भारमल ने कूटनीति का प्रयोग किया तथा मीनों को जागीरे ,राज्य का पुलिस सुरक्षा प्रबंध ,खजांची,सेना के कई प्रमिख ओदे,तोपखाना आदि की जिम्मेदारी दी तह कई किलों नाहरगढ़,जैगढ़ की किलेदारी भी दी 21 जागीरे और प्रमुख दरबारी सरदारों में भी स्थान दिया था उस समय जागीरदार राजा को सेनिक सहायता दिया करते थे यहाँ यह कहा जा सकता है की इस बहादुर और लड़ाकू कौम मीना के सेनिक दस्ते भी राजा मानसिंह की सेना में थे | क्योकि मुग़ल दरबार से आदेश मिलने पर राजा मानसिंह ने एक विशेष सेनिक दल भर्ती किया था जिसमे मीना और मेवाती थे | .6 जनवरी 1601 ई० में असीरगढ़ पर पूर्ण विजय मिलने पर अकबर ने दानियाल को दक्षिण का जिसके अंतर गत खानदेश,बरार,और अहमद नगर का कुछ भाग था जिसकी राजधानी दोलताबाद थी दिया | दानियाल की मृत्यु 1604 के बाद मानसिंह 1609 में जहागीर के समय प्रधान सेनापति शहजादा परवेज के सहयोग में गए 5 साल की सेवा के बाद 6 जुलाई 1614 को एलिचपुर में उनका देहांत हो गया | उनके बाद गडा और दौसा के जागीरदार कुवर महा सिंह को भेजा गया 20 मई 1617 में बरार के बालापुर में इनका भी देहांत हो गया यहाँ यह बताना भी उचित होगा की जब महासिंह को दौसा की जागीर मिली तो उसकी सेना में दौसा क्षेत्र के लोग अवश्य होंगे खोकड़ सरदार रामो जी महासिग की सेना में प्रमुख ओहदेदार रहे होंगे संभव यह है की खोखड सरदार के नेत्रित्व में हजारों मीना और मेवाती सेनिक दक्षिण में महासिंह के साथ गए बरार के बालापुर में जहाँ महासिंह जी का देहांत हुवा वह स्थान अकोला से 50 किलोमीटर और अमरावती से 100 किलोमीटर ही है जहा कई गाँवो में मीना परदेशी राजपूत के नाम से आज भी बसे हुए है साथ ही औरंगाबाद(प्राचीन खिड़की) में खोखडपूरा(अब एक कोलोनी) और भाव सिंह पूरा गाँव भी है जो संभवत मीना खोखड सरदार और राजा मान सिंह के पुत्र भाव सिंह जिन्हें महा सिंह के बाद दक्षिण में नियुक्ति मिली का देहांत भी बालापुर में सन 1622 ई० में हुवा था की यादगार में बसाये गए होंगे | महासिंह और भाव सिंह के समय भी मीना 10 से 1000 तक के मनसब थे तोपखाना हजुरी तो पूरी तरह मिनाओ के ही अधीन था | फिर अगला दस्ता जयसिंह के साथ गया लगभग 1656 ई० में | जो लोग 1609 में गए थे वो वापिस घर नहीं आये बाद में गए वो भी उनसे मिल गए | दक्षिण में गए मिनाओ ने कई विजय प्राप्त की और अदम्य साहस का परिचय दिया | बाद में जयसिंह के लोटने व मुगलों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर इन सेनिको को निकला गया जिन्हें शिवाजी ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए शिवाजी ने उन्हें पद और ओहदे दिए जमीने दी | मिनाओ की गुर्रिला युद्ध निति आगे जाकर शिवाजी महाराज की प्रमुख युद्ध रणनीति बन गई | मराठे और मीना साथ मिलकर मुगलों से लडे | भाईचारा बढ़ा और ये वाही के होकर रह गए |