महाराष्ट्र राज्य से राजस्थान तक: महाराष्ट्र

 महाराष्ट्र राज्य से

राजस्थान तक: महाराष्ट्र


परदेशी राजपूत (राजस्थान के मीना )


महाराष्ट्र में भी परदेशी,राजपूत, नाम से राजस्थान से करीब 400 साल पहले 1600-1700 ई० के बीच राजा मानसिंह, महासिंह, भावसिंह और जयसिंह से साथ सैनिको के रूप में दक्षिण के खानदेश, अहमद नगर, बीजापुर, और गोलकुंडा विजय करने गए जयपुर के राजाओ को वहा की सुबेदारी मिलने पर लम्बे समय रहने के गए सेनिक व सहयोगी वही बस गए जय सिंह के देहांत के बाद मुग़ल सूबेदारों ने आर्थिक संकट के कारन सेना कम कर दी उन सैनिको को शिवाजी मराठा ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए वो ही मीणा लोग परदेशी राजपूत है | महाराष्ट्र में बसे परदेशी राजपूत (मीना) वहां आपस में कावच्या, भातरया,और सपाटया नाम से एक दुसरे को संबोधित करते है | संयोगवश यह नाम राजस्थान में भी प्रचलित है | जब यहाँ के मीना महाराष्ट्र में गए तब आज का पचवारा,नागरचाल, खैराड,तलेटी, बवान्नी, बयालिसी, के क्षेत्र को कवाच्या कहते थे इसलिए महाराष्ट्र में कवाच्या शब्द का प्रयोग हुवा | मेवात (अलवर-भरतपुर), डूंगरवाड, काठेड (नरौली बैर भरतपुर),जगरोटी (हिंडौन करोली), आंतरी,नेहडा (अलवर), डांग (करोली धोलपुर ) इस क्षेत्र को 350-400 वर्ष पूर्व भातर प्रदेश कहते थे जिसकी राजधानी माचाड़ी थी राजस्थान के भातर प्रदेश निकले मीना माहाराष्ट्र में भातरया, बहदुरिया (करोली की प्राचीन राजधानी बहादुरपुर थी ), बहतारिया, कहलाते है | सपाट (सपाड) प्रदेश से गए हुए राजस्थान के मीना लोगो को मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में सापडया (सपाट्या) कहते है | खंडार तहसील का क्षेत्र,श्योपुर का क्षेत्र, चम्बल, और पार्वती नदी के बीच का क्षेत्र और समस्त हाड़ोती(कोटा,बारां,झालावाड) सापडया क्षेत्र कहलाता था | ये लोग महाराष्ट्र के 15 जिलों की 35 तहसीलों के लगभग 325 गाँवो में रहते है | हम इनका इतिहास ढूंढ रहे है कुछ दस्तावेज भी मिल रहे ...राम सिंह नोरावत जी भी 1949 में वहा गए लोगो से मिले जिसका विवरण अपनी डायरी में लिखा और उस समय की मीणा वीर पत्रिका में छपवाया ओरंगाबाद में मीणा खोखड़ सरदार रामो जी खोखड़ के युध्द में शहीद होने पर उनके नाम से गाँव बसा हुवा है जो औरंगाबाद की एक कोलोनी बन चूका .|.खंडिप गंगापुर के उदय सिंह लकवाल वैजापुर /बीजापुर के युद्ध में वीरगति पाई थी जागा उनके परिवार का महाराष्ट्र से संवत 1730 में आना बताते है जिनको उस गाँव में आज भी मराठा थोक कहते है | कुरहा (अमरावती,बरार ) महाराष्ट्र में एक प्राचीन पपलाज माता जी का बहुत बड़ा मंदिर है पास ही 4 किलोमीटर दूर तिउसा गाँव में एक प्रसिद्ध ताजी गोत्र का मीना परिवार के लोग रहते है जिसमे नारायण सिंह ताजी ख्याति प्राप्त रहे है उनके वन्सजो का निकास भगवतगढ सवाई माधोपुर से होना बताते है करीब 300 साल पूर्व यहाँ से ले जाकर कुरहा में माता जी की स्थापना की गई है नारायण सिंह ताजी की शादी भी करीब 100 साल पहले जयपुर के किसी बड़दावत गोत्री मीणा के यहाँ हुई थी | विट्टल सिंह जी डाडरवाल और प्रताप सिंह जी पैडवाल अपनी वन्सवाली जानने डिगो लालसोट के जागाओ के पास 50 साल पहले आये थे | हम अपना वजूद भूले हुई समाज के लोगो को अपना वजूद जानने में सहयोग कर रहे है | हम 2004 से निरंतर उनके संपर्क में है | 6-2- 2013 व फ़रवरी 7-9 मार्च 2014 को हम महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले की गंगापुर तहसील के कुछ गाँवो में भी जाकर आये है पुराने लोगो का पहनावा,भाषा रीतिरिवाज सब अपने जैसे ही है उनको अपनी मूल भूमि से जोड़ने के लिए सभी का सहयोग अपेक्षित है | सभी के प्रयास से राजस्थान में महाराष्ट्र से अब तक 18 शादिया लालसोट, गंगापुर, निवाई, उनियारा, नैनवा, कोटा, बोंली, मालपुरा, जयपुर में हो चुकी है |


किसी समय प्राचीन राजस्थान के अधिकांश हिस्से पर मीना राजाओ का अधिकार था आमेर उनमे प्राचीन था जो मं गणों का संघ था कच्छावा राजपूत नरवर प्रदेश मध्यदेश से जाकर आमेर धोखे से मिनाओ से छिना काफी लम्बे समय तक मीना संघर्ष करते रहे आखिर भारमल कछावा के अकबर की अधीनता स्वीकार करने और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के बाद उसकी शक्ति बढ़ गई थी तथा मीना पूर्णरूपेण अपनी शक्ति खो चुके थे फिर भी निरंतर संघर्ष जारी रखे हुए थे परन्तु इस मनोमालिन्य को पूरी तरह से मिटने के लिए भारमल ने कूटनीति का प्रयोग किया तथा मीनों को जागीरे ,राज्य का पुलिस सुरक्षा प्रबंध ,खजांची,सेना के कई प्रमिख ओदे,तोपखाना आदि की जिम्मेदारी दी तह कई किलों नाहरगढ़,जैगढ़ की किलेदारी भी दी 21 जागीरे और प्रमुख दरबारी सरदारों में भी स्थान दिया था उस समय जागीरदार राजा को सेनिक सहायता दिया करते थे यहाँ यह कहा जा सकता है की इस बहादुर और लड़ाकू कौम मीना के सेनिक दस्ते भी राजा मानसिंह की सेना में थे | क्योकि मुग़ल दरबार से आदेश मिलने पर राजा मानसिंह ने एक विशेष सेनिक दल भर्ती किया था जिसमे मीना और मेवाती थे | .6 जनवरी 1601 ई० में असीरगढ़ पर पूर्ण विजय मिलने पर अकबर ने दानियाल को दक्षिण का जिसके अंतर गत खानदेश,बरार,और अहमद नगर का कुछ भाग था जिसकी राजधानी दोलताबाद थी दिया |


दानियाल की मृत्यु 1604 के बाद मानसिंह 1609 में जहागीर के समय प्रधान सेनापति शहजादा परवेज के सहयोग में गए 5 साल की सेवा के बाद 6 जुलाई 1614 कोएलिचपुर में उनका देहांत हो गया | उनके बाद गडा और दौसा के जागीरदार कुवर महा सिंह को भेजा गया 20 मई 1617 में बरार के बालापुर में इनका भी देहांत हो गया यहाँ यह बताना भी उचित होगा की जब महासिंह को दौसा की जागीर मिली तो उसकी सेना में दौसा क्षेत्र के लोग अवश्य होंगे खोकड़ सरदार रामो जी महासिग की सेना में प्रमुख ओहदेदार रहे होंगे संभव यह है की खोखड सरदार के नेत्रित्व में हजारों मीना और मेवाती सेनिक दक्षिण में महासिंह के साथ गए बरार के बालापुर में जहाँ महासिंह जी का देहांत हुवा वह स्थान अकोला से 50 किलोमीटर और अमरावती से 100 किलोमीटर ही है जहा कई गाँवो में मीना परदेशी राजपूत के नाम से आज भी बसे हुए है साथ ही औरंगाबाद(प्राचीन खिड़की) में खोखडपूरा(अब एक कोलोनी) और भाव सिंह पूरा गाँव भी है जो संभवत मीना खोखड सरदार और राजा मान सिंह के पुत्र भाव सिंह जिन्हें महा सिंह के बाद दक्षिण में नियुक्ति मिली का देहांत भी बालापुर में सन 1622 ई० में हुवा था की यादगार में बसाये गए होंगे | महासिंह और भाव सिंह के समय भी मीना 10 से 1000 तक के मनसब थे तोपखाना हजुरी तो पूरी तरह मिनाओ के ही अधीन था | फिर अगला दस्ता जयसिंह के साथ गया लगभग 1656 ई० में | जो लोग 1609 में गए थे वो वापिस घर नहीं आये बाद में गए वो भी उनसे मिल गए |


दक्षिण में गए मिनाओ ने कई विजय प्राप्त की और अदम्य साहस का परिचय दिया | बाद में जयसिंह के लोटने व मुगलों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर इन सेनिको को निकला गया जिन्हें शिवाजी ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए शिवाजी ने उन्हें पद और ओहदे दिए जमीने दी | मिनाओ की गुर्रिला युद्ध निति आगे जाकर शिवाजी महाराज की प्रमुख युद्ध रणनीति बन गई | मराठे और मीना साथ मिलकर मुगलों से लडे | भाईचारा बढ़ा और ये वही के होकर रह गए ।

वि.के.मीणा


जयपुर महाराजा समय-समय पर मीणा जमींदारों से सैनिक सहायता लेते रहते थे। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उससे भी आगे दक्षिण में अधिकतर मीणों का निष्क्रमण जयपुर महाराजा के सैनिक अभियानों के दौरान ही हुआ था। वहा¡ उन्हें जमींदारिया¡ प्रदान कर बसाया गया था और इसी कारण वे वहा¡ `परदेशी राजपूत` कहलाने लगे थे। यह सब इतने विस्तार के साथ इसलिए लिखा गया है कि टोडाभीम परगने में जोरवाल मीणा जमींदारी का अस्तित्व हृदयगंम हो सके।

टोडाभीम और बामवास क्षेत्र के मीणां जमींदारों के शक्ति-प्रदर्शन के अनेक किस्से सुनने को मिलते हैं। गंगािंसह द्वारा लििाख्त `यदुवंश` (प्रथम भाग) में बामनवास के मीणा सरदार का जिक्र है जो अपने क्षेत्र का मुखिया था। उसने अपने इलाके का लगान जयपुर दरबार को नहीं चुकाया और घोषणा कर दी- `जो उसे मल्लयुद्ध में हरा देगा, उसे वह लगान देगा। महाराज यदि लगान वसूली को भेजते हैं तो किसी अकेले को भेजें जो मुझे मल्लयुद्ध में हराकर लगान ले जाये।` सन् 1756 के आसपास भरतपुर राज्य के पथैना के ठाकुर अजीतसिंह तत्कालीन भरतपुर नरेश से मनमुटाव के कारण जयपुर आ गये। बामनवास के मीणा सरदार को अजीतसिंह ने मल्लयुद्ध में पराजित किया। महाराज जयपुर ने खुश होकर बामनवास की सवा लाख की जागीर अजीतसिंह के नाम कर दी। लेकिन सात साल बाद अजीतसिंह अपने गृह राज्य में लौट गये। 

अलवर जिले की थानागाजी तहसील के गा¡व हमीरपुर में लाला नीमवाल द्वारा निर्मित तीन चौक की हवेली और घुड़साल देखने से पता चलता है कि अठारवीं सदी में जयपुर रियासत में शक्तिशाली मीणा जमींदार थे। मीणों के अनेक बड़े-बड़े गा¡वों में मीणा सरदारों के पास रह¡कड़ा, रामचन्दी (छोटी तापें) तथा तोपें रहती थी।। कुछ गा¡वों के कब्जे में आज भी ये देखी जा सकती हैं। 

भगवान अद्युतानन्द गिरि द्वारा सन् 1942 में लिखित बारा मेवाशियों का संक्षिप्त इतिहास में टोडाभीम के जोरवाल (जुणवाल) तथा बामनवास के लोदवाल मीणों के सम्बन्ध में लिखा है - 

`जुणवाल मीणा राजपूत निजामत हिण्डोन के परगने में मशहूर हैं। पहले जमाने में राजा की तरफ से काफी मुर्तबा हासिल कर चुक हैं जो खानदान के बगदाव में मशहूर है। ।`

`बामणोस में लोदवाल काराडे (का¡टिया) गोत के मीणा राजपूत रहते हैं और इनको भी राज की तरफ से अच्छे मुर्तबा में शामिल किये जाते हैं। पा¡च नाम के गोत के मीणा राजपूतों को बादशाही जमाने से पालकी कडवाई की मंजूरी हुई।

टोडाभीम पर कछवाहों के आधिपत्य से पूर्व, प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार उस पुराने जमाने में टोडाभीम 300 खेड़ाओं (गा¡वों) की राजधानी थी और तब टोडाभीम का जोरवाल मीणा मुखिया उन 300 खेड़ाओं से चौथ वसूल करता था - 

जोधा, शहर टोडा बैठ्यो,

तीन सौ खेड़ा की चौधराहट लीन्हीं।

तीन सौ तिलक टोड़ो बण्यो,

कलसड़े कामन्ना भेंट आयी। 

(सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

इस तथ्य को पुराने लोग आज भी छाती ठोककर उजागर करते रहते हैं कि सिकराय-टोडाभीम-निठार के बीच का लगभग 40-50 किलोमीटर का क्षेत्र पुराने जमाने में जोरवाल मीणाओं के अधीन था। सिकराय के जोरवाल मीणा परिवारों के लोगों को आज भी जागीरदार पदवी के साथ सम्बोधित किया जाता है। सिकराय का श्यामा जोरवाल, टोडाभीम का जोधा और ऊदा जोरवाल तथा निठार का रीठा जोरवाल अपने समय के अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति थे। `कुआल का पुरा` का जयकिशन पटेल और जिन्सी का पुरा भांवरा का जिन्सी पटेल बामनवास के प्रसिद्ध जमीदार थे।

टोडाभीम तथा अन्य स्थानों पर राजपूतों का प्रभावशाली नियंत्रण हो जाने पर राजपूत शासकों ने चौथ वसूली के लिए प्रभावशाली जोरवाल मीणा सरदारों को अपने-अपने क्षेत्र में चौधीर की सम्मानित पदवी प्रदान की। टोडाभीम का चौधरी हाथीबन्द था। अपने इलाके में जाने के लिए हाथी की सवारी का इस्तेमाल करता था। चौधरी को पलाकी भी मिली हुई थी। कचहरी में जाने के लिए वह पालकी का इस्तेमाल करता था। हाथी और पालकी का सारा खर्चा राज्य के जिम्मे था। टोडाभीम में :आमिल´ नामक पदाधिकारी रहता था। वह जयपुर महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में इस क्षेत्र के लगान सम्बन्धी कार्योको देखता था। सन् 1693 के आसपास जयपुर नरेश बिशनसिंह द्वारा टोडाभीम में नियुक्त आमिल का नाम चूड़ामलदास था। 

जब-जब भी किसी आमिल या जागीरदार ने इस क्षेत्र के जोरवाल चौधरी के अधिकारों को कम प्रयास किया, तब-तब जोरवाल चौधरी अपने भाई-बन्धुओं की सहायता से उनके खिलाफ संघर्ष छेड़ देते थे। एक ऐसी ही खींचातानी में गज्जू जोरवाल के पुत्र मालदे ने अपने साथियों को लेकर अपने क्षेत्र के ठाकुर के गढ़ को घेर लिया। इस संघर्ष में इाकुर हार गया। मालदे ने उसे पकड़ लिया और सब मिलकर उसके लिए सजा तजबीज करने लगे। गम्भीर स्थिति देखकर ठकुरानी बाहर आई और मालदे से ठाकुर के प्राण-रक्षा की गुंहार की। इसके ऐवज में ठकुरानी ने मालदे की दासी तक बनना स्वीकार कर लिया। इस सम्बन्ध में निम्न पद्य प्रचलित है -

तरकश कछनी का¡छ के चार वाल घेरी।

अबके बखस दे गज्जू के मालदे,

मैं चरणन की चेरी

(सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

[25/12 3:45 pm] मीणा प्रकाश चंद गोठवाल: मीणा राजपूत

सिकराय, टोडाभीम हिण्डौन और बामनवास सहित समूचा पचवारा क्षेत्र पुराने जमाने में मीणाओं का गढ़ रहा था। इस क्षेत्र के प्रशसन पर कछवाहों की पकड़ बड़ी मुश्किल से हो पाई थी। उससे पहले इस लम्बे-चौड़े इलाके पर एकछत्र मीणाओं का वर्चस्व रहा था। तब और उसके बाद तक मीणाओं का यहा¡ राजपूत कहा जाता था, राजपूत माना जाता था और राजपूत बताया जाता था (मीणा राजपूत)।

टोडाभीम के जोरवाल मीणा जमींदार को शासक-प्रशसक की सारी शक्तिया¡ प्राप्त थीं, जैसे दीवानी, फौजदारी, मालगुजारी, पदनाम (रावत या चौधरी), निशान, नक्कारे आदि-आदि। बादशाह अथवा महाराजा की ओर से उन्हें वर्ष में दो बार नियमित रूप से शिरोपाव (पगड़ी) और भेंट मिलती रही थी जो उनके सामन्त होने का साफल सबूत है।


वि.के.मीणा


लालसोट:-


बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि देश के महानतम बौध्द स्तूपों मेँ कभी लालसोट (जिला दौसा राजस्थान) के बौध्द स्तूप की भी गणना हुआ करती थी । आज जहां मुसलमानों ने कब्रगाह बना रखे है और जिसे इमाम बाड़ा नाम दे रखा है । किसी समय महात्मा गौतम बुध्द के पावन अवशेषों की स्मृतियों का विशाल बौध्द स्तूप था । इस स्थान पर बने विशाल बौध्द स्तूप का मुख्य भवन तो नष्ट हो चुका है परन्तु कई बड़ी बड़ी छतरियों के भग्नावशेष अभी भी दिखाई देते है ।


ब्रजमोहन द्विवेदी ने लालसोट के इतिहास मे इस स्थान के बारे मे लिखा है । कुछ वर्ष पूर्व श्रीलंका के भारत स्थित राजदूत कुछ प्राचीन दस्तावेजों की पाण्डुलिपियों सहित लालसोट आये थे । इस प्रसिध्द बौध्द स्तूप की वर्षोँ से उपेक्षा और दुर्दशा देखकर उन्हें अपार मानसिक पीड़ा हुई थी । लालसोट में अशोक कालीन छतरी भी है । लालसोट मेँ बौध्द स्तूप मिलने से मान्यता स्थापित होती है कि पिप्पलिवन के मौर्यो ने बुध्द की चिता भस्म के अवशेषो को रेढ (निवाई के पास जिला टौँक) जहां बुध्द धर्म से संबंधित पात्र मिले है । यहाँ से चिता भस्म का कुछ अंश या सम्पूर्ण अंश तत्कालिन समय मे लालसोट में स्थानान्तरित हुए । संभवतः पिप्पलिवन के मौर्यो ने चिता भस्म के अंशो को बाटकर एक से अधिक स्थानों पर तत्कालिन समय अथवा कालान्तर में बौध्द स्तूप बनाये गये थे । राजस्थान के जिला दोसा के भांडारेज जहाँ भाभड़ा गोत्र के मिनाओ का लम्बे समय तक शासन रहे मेँ भडान माता के मंदिर के प्राँगण मैँ बौध्द स्तूपों के मुंडेर तथा स्तम्भ मिले है । भांडारेज से प्राप्त बौध्द स्तूपोँ के पुरावशेष लालसोट के समकालिन है ।उक्त सभी क्षेत्रो के मीना प्राचीन शासक रहे है मौर्यो के पुर्वज महाभारत कालिन राजा मोरध्वज(जिसे मीनावंशी शासक मानते है) की मोरा नगरी या मोरागढ़ नादौती जिला करौली राजस्थान मे है इसी प्रकार मीना आदिवासियो की प्राचीनतम राजधानी विराट नगर का भी महात्मा बुध्द व मौर्यो का गहरा सम्बंध है मीना मोरा माता को कुल देवी भी मानते है और उनमेँ मोर,मोर्य,मोरड़ा,मोरेजा,मुराडा,मुराडिया कई गौत्र भी मोर्यो से सम्बन्ध स्थापित करते है ।


बौध्द धर्म साहित्य में मौर्यों के संबंध में तीन स्थान ज्ञात होते है - 1- पिप्पलिवन, 2- न्योग्रधवन व 3- मोरिय- मोलिय नगर इनमे प्रथम व तीसरे स्थान की स्थिति राजस्थान मे पाई जाती है । पिपरावा के समीप कपिलवस्तु की समीपता और प्राप्त अस्थि कलश पर शाक्यो द्वारा बौध्द स्तूप बनाये जाने का वर्णन मिलने से पिपरावा को मौर्यो का पिप्पलिवन-पिप्पलिवाहन होना मिथ्या प्रमाणित है जनार्दन भट्ट ने बुध्द के अंतिम संस्कार व अस्थि बटवारा के प्रसंग में जो कुछ लिखा है वह पिप्पलिवन के मौर्यो के मूल स्थान को जानने के लिए महत्तपूर्ण साक्ष्य है ।डॉ. प्रहलाद मीणा ने अपने शौध्दपूर्ण लेख " मौर्य वंश मीन वंशी मीणा क्यों और कैसे ? " मे मोरिय ग्राम को जिला करौली के मोरागढ़ को मानते है । एस पी सिँह ने भी लिखा है कि बुजुर्गो के अनुसार मोरा ग्राम राजा मोरध्वज से भी बहुता प्राचीन है आज का मोरा तो पहाड़ की तलहटी मेँ बसा हुआ है किन्तु प्राचीन मोरा गाँव पहाड़ के ऊपर बसा हुआ रहा है जिसके अवशेष आज भी वहां बिखरे पड़े है वहाँ मीणाओ की एक शाखा की कुल देवी मोरा माता का भी मन्दिर है ।साथ ही महात्मा बुध्द के अंतिम संस्कार व अस्थि बटवारा प्रसंग के अध्ययन से स्पष्ट होता है की पिप्पलिवन आठ जातियों के राज्यों से दूर दराज के क्षेत्र मे था ।


डॉ. प्रहलाद के मतानुसार पिप्पलिवन की भौगोलिक स्थिति मौरेल नदी के तटवर्ती जिला टोंक की निवाई तहसील अन्तर्गत होनी चाहिए मौरिल नदी वर्तमान में जिला दौसा के बड़ा गाँव बंधा से होकर हेमल्यावास व कूपावास ग्रामों के पास होती हुई लालसोट तहसील की पश्चिमी व दक्षिणी भाग की सीमा बनाती हुई सवाईमाधोपुर जिले मे प्रवेश कर जाती है मल्ला मरमट मीणा के 1300 वर्ष पुराने गाँव मलारना चौड़ के पास से होती हुई मलारना स्टेशन से 10 किमी दूर हाड़ोती नामक स्थान से बनास नदी मे मिल जाती है जिला जयपुर की चाकसू तहसील व जिला टोंक की निवाई तहसील का सीमा क्षेत्र मौरेल को स्पर्श करता है । एक साम्यता मौरेल नदी के बहाव क्षेत्र के आस पास के क्षेत्रों में भी मोरों की बहुलता थी । ऐसे ही पिप्पलिवन मे भी मोरों की बाहुल्यता थी । निवाई का पहाड़ रक्तांचल पर्वत कहलाता है । इस पहाड़ की तलहटी मे मल्ला मरमट की गौत्री लोगो का हजारों साल पुराना गांव बरथल स्थित है ।जो मरमट गोत्र के मिनाओ का निकास गाँव माना जाता है इस पर एक ऐतिहासिक विरुदावली जनमानस मे प्रचलित है -


" पाल पिपलि पहाड़ कौन हलायौ पान । हाड़ा मरमट जन्मीया बाज्या ढोल निशान ॥ "


पाल पिपलि पहाड़ की तलहटी में पिप्पलिवन होना चाहिए निवाई क्षेत्र में पिप्पलि झिराना व पिराना प्राचीन ऐतिहासिक महत्व के गांव है । निवाई क्षेत्र के रेढ़ गांव से तो बौध्दकालिन अवशेष मिले है । पिप्पलिवन में मयुरों(मोरा) की बाहुल्यता, मोरेल नदी के तटवर्ती स्थानों पर प्राचीन काल में मयुरोँ की बाहुल्यता, जिला टौँक की निवाई तहसील में पाल पिप्पलि पहाड़ होने की संभावना,डॉ के एन पुरी द्वारा पुरावशेषों के आधार पर रैढ मेँ बुध्द अस्थियों के अवशेष होने का अनुमान लगाना, मोरण व राजा मोर ध्वज का प्राचीनतम मोरागढ़ नगर होना ,मीणो मे मोर,मोरिया,मोरड़ा,मोरी मोरिजा,ताजी और गौत्र होना,अन्तिम मौर्य सम्राट चित्रांगद के वंशज राज राजा मान मोर को मीना मानना , लालसोट,भाण्डारेज में बोध्द स्तूप का होना आदि सम्मिलति साक्ष्यों से पिप्पलिवन मोरेल नदी के समीपवर्ती क्षेत्र मे होने की मान्यता स्थापित होती है । मौर्य वंश प्राचीनतम मीन गणधारी लोगो की एक शाखा थी ।


गंगापुर और सवाई माधोपुर के बीच में खेड़ा की डूंगरी के नीचे खेड़ा बाढ़ गांव बसा हुआ था इस गांव से निकले मौर-मोरये,मोरड़ा गौत्र के मीणाओ ने मोराड़ा(मुराड़ा) गाँव बसाया मुराड़ा गांव के नाम से मुराड़िया गोत्र का नामाकरण हुआ । रणथम्भौर के शासक टाटू मीणा और खेड़ा बाढ़ के मौर मौर्य मीणाओ मे संघर्ष की एक जन श्रुति जानकारी भी मिलती है सूरज जिद्दी ने अपनी पुस्तक "रणथम्भौर" में रणथम्भौर के पहाड़ो में मौर मोरड़ा,उषारा गौत्र के आदिवासी मीणों का बसा होने का उल्लेख राजा जैता के प्रसंग मे किया है । गढ़ मोरा के समीपवर्ती क्षेत्र मेँ वामनवास के समीप ककराला नामक ग्राम है जिसे कर्क मौर्य के वंशजो ने बसाया ।


कांकरवाल गोत्र के मीणा का निकास ककराला से बतलाया जाता है इनकी कुलदेवी मोरा माता है ककराला का प्राचीन नाम ककराल गिरी था रणथम्भौर के राजा हम्मीर के दिग्विजय अभियान में ककराल गिरि का नाम आता है लालसोट के शासक और प्राचीनकाल से इस क्षेत्र मे बसे घुणावत गौत्र के मीणाओ की कुल देवी भी मोरा माता है जिसका स्थान घुमणा गाँव मे है । लालसोट के पास देवली इनका प्राचीन गांव है । बाद मे लालसोट से निकले मीणा लालसोट्यो व लोटन कहलाये । इन सब तथ्यो से सिन्धुघाटी के मीन गणचिन्ह लोगो, तमिल व द्रविड़ शब्द नामधारी मीना लोगो,महाभारत के मत्स्यो(मच्छा,मीना,मीणा),वर्तमान मीणा आदिवासियो का बुध्द और मौर्य वंश से प्रगाढ़ और कुटुम्भिय सम्बन्ध जरुर रहा है ।


जैन मुनि मगन सागर ने सन 1937 मेँ लिखा है कि जैन लेखको ने चन्द्रगुप्त को मत्स्य राज्य के दक्षिण में स्थित मौर्य राज्य का राजकुमार माना है । मौर्य राज्य की राजधानी गढ़ मौरा थी अस्तु हमारी यह धारणा कि महाराज चन्द्रगुप्त मौर्य राजा मौरध्वज की वंशावलियों में से है और महाराज चन्द्रगुप्त भी मीनाओ की ही एक शाखा मे से है । इसमें कोई संदेह नहीं है । अतः मोर्य के बौध्द होने के कारण मीनाओ का भी महात्मा बुध्द से सम्बन्ध रहा है ।डॉ. सी एल शर्मा ने लिखा है कि रैढ़ (निवाई के पास) से प्राप्त पुरावशेषों से सेल खण्डी से बने बक्से एवं पालिसदार बौध्द धर्म से संबंधित पात्र है । इस प्रकार की वस्तुओ की प्राप्ति प्रायः उन्हीँ स्थानों पर हुई है जहां बोध्द धर्म का बोलबाला एवं प्रभाव था ।


डॉ. केदार नाथ पुरी ने भी इन पात्रोँ एवं बक्सों का अवलोकन कर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि इस प्रकार के पात्र उन स्थानों पर मिलते है जहां भगवान बुध्द की अस्थियाँ रखी जाती थी । अतः यह कहा जा सकता है कि मीणा आदिवासी बहुल यह मोरेल नदी का क्षेत्र बोध्द धर्म के प्रभाव व मोर्यो से सम्बन्धित प्रमुख क्षेत्र था ।पुष्कर से भी महात्मा बुध्द का तालुक रहा है लालसोट से लगभग 40 किमी दूर प्राचीन व ऐतिहासिक स्थल चाकसू (जयपुर) से बौध्द की प्राचीन प्रतिमा केवल सिर की आकृति के रुप मेँ ही मिली, सरिस्का वन क्षेत्र(मत्स्य प्रदेश) से भगवान बुध्द की प्रतिमा प्राप्त हुई है । डॉ. शंभू लाल दोषी व डॉ. नरेन्द्र व्यास ने लिखा है कि यह अवश्य है कि मीणों का उल्लेख 500 ई.पूर्व मिलता है । पर ये इस स्थल के इससे भी प्राचीन निवासी है ।


यह इतिहास बताता है कि दौसा के पूर्व 18 किमी मोरेल नदी का उद्गम इस नदी के किनारे मोरन शहर का विकास हुआ । यह शहर बाद मे चलकर राजा मौर्यध्वज के मौर्य साम्राज्य की राजधानी बना इस शहर के नागरिक मोरेजा या मोरेड़ा कहलायत थे । इसी वंश के किसी छोटे मुखिया के चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म हुआ जिसने एक विशाल मौर्य साम्राज्य की नीँव डाली और उसकी पुत्र अशोक महान ने उसे विशाल बनाया और बौध्द धर्म अपनाया जिसका प्रभाव उसके वंशज लोगो पर भी पड़ा । अशोक ने अपने प्राचीन वंश मीन (मत्स्य) की प्राचीन राजधानी विराट नगर (जयपुर) मे अपना सातवा धम्म शिला लेख लगवाया । बहुजन वर्ग मे बौध्द धर्म का काफी प्रभाव था पर पुष्यमित्र शुंग ने सब कुछ तहस नहस कर दिया बौध्द धर्म को संरक्षण देने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहदत्त का वध कर दिया । बृहदत्त के किसी वंशज चित्रांगद मौर्य ने चित्तोड़ की स्थापना कर राज्य स्थापित किया ।

 चित्तोड़(राजस्थान) के अंतिम राजा मानमौर जिसे कई ग्रन्थो मे मीना बताया गया है शायद इसलिए कि मौर्य वंश भी मूलतः मीन वंश की एक शाखा थी । राजा मानमौर ने बप्पा रावल को धर्म भानजा बना कर रखा परन्तु बाद मे बप्पारावल ने ही मानमौर की हत्या कर सत्ता ली जिसमे आगे जाकर कुभ्भा,सांगा,उदय सीँह व महाराणा प्रताप हुए । इस प्रकार मौर्य अपने मूल स्थान मे आकर वापिस मीन वंश मे ही विलिन हो गये मीन वंश बहुजनो से भी सम्बध रहा है पर आज मीन वंश से कई जातियाँ बन गई जो अपने मूल को भूल गई ।यह सब आप सब आदिवासी भाइयो का प्यार और समर्थन है जिसकी ऊर्जा से थोड़ा बहुत लिखकर आदिवासी युवाओ को जागृत करने का एक छोटा सा प्रयास कर पा रहा हुँ । यह सब हमारा सम्मिलित प्रयास है जो सतत बना रहे 

चाणक्य ने मोर्यकाल में आटविक लोगो को मौर्य सेना में भर्ती किये थे उसकी नीति थी की आदिवासियो को नाराज नही करना चाहिए इनके किले मजबूत होते है ये घनी आबादि मे बसे होते है नीडर बहादूर होते है, दिन दहाड़े युध्द के लिए तत्पर रहते है ये भारी हानी पहुचा सकते है इनको दुश्मनो से लड़ने में काम लेना चाहिए । उनको सेवा के बदले उपज का कुछ हिस्सा देना चाहिए ।


वर्तमान हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है कि सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने सुनाम व समाना के विद्रोही जाट व मीनाओ के संगठन ' मण्डल ' को नष्ट करके मुखियाओ को दिल्ली ले जाकर मुसलमान बना दिया ( E.H.I, इलियट भाग- 3, पार्ट- 1 पेज 245 ) इसी पुस्तक में अबोहर में मीनाओ के होने का उल्लेख है (पे 275 बही) इससे स्पष्ट है कि मीना प्राचीनकाल से सरस्वती के अपत्यकाओ में गंगा नगर हनुमानगढ़ एवं अबोहर- फाजिल्का मे आबाद थे । हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है । हरियाणा के फतेहाबाद जिले में जाँड वाला शोतर गाँव में मीणा के कम से कम 1000 वोट आज भी है उनका गोत्र कागन्स है | ऐसा कोई क्षेत्र न था जो मिनाओ के अधीन न रहा हो | सिंगली सारसोप गाँव सवाई मदोपुर में भी कांगस गोत्र के मीणा लोगो का रुतबा और दबदबा था |


कर्नल टॉड की पुस्तक के पृष्ठ-507-520तक उल्लेख है की उदयपुरवाटी सीकर के पास कासरग्ढ़ दुर्ग था जगाओ की पोथी से तथ्य सामने आते है की कांगस,कान्सरवाल गोत्र के मिनाओ की प्राचीन राजधानी थी ..उदयपुरवाटी का प्राचीन नाम कुसुम्बी अथवा काईस था इसके अंतर्गत चार भागों में विभक्त 45 गाँव थे वही छापोलीगढ़ भी था जो छापोला गोत्र के मिनाओ की राजधानी था यह क्षेत्र चौहानों और तोमरो ने मीणा आदिवासियों से धोके से छिना आमेर के राजा उदयकरण पड़पोते बालो जी ने 15 वी सदी में यह क्षेत्र अपने अधिकार में किया देवासी तथा कांसली (कासरग्ढ़) कुछ समय चंदेलो के अधीन भी रहे शेखा जी के पुत्र रायमल की सेवा से खुश होकर अकबर ने देवासी तथा कांसली के नगरो का अधिकार दिया रायमल के बाद कांसली और 84 गाँव उनके पुत्र तिरमल राव को मिले जयसिंग के समय सुजान सिंह छापोली गढ़ और दीप सिंह कांसली के सरदार बने चाँद सिंह सीकर के जागीरदार बने उनके देवी सिंह हुए उन्होंने लक्ष्मण सिंह को गोद लिया लक्ष्मण सिंह ने अधीनस्थ को निर्मल बना दिया उनके दुर्गो को भूमिसात कर दिया जिनमे कासली और छापोली गढ़ प्रमुख थे | इन गढ़ों के भूमिसात होते ही मीणा इतिहास के ऐतिहासिक साक्ष्य भी नष्ट हो गए | ये छोटे छोटे आटविक राज्य थे |


महाभारत के काल का मत्स्य संघ की प्रशासनिक व्यवस्था लौकतान्त्रिक थी जो मौर्यकाल में छिन्न- भिन्न हो गयी और इनके छोटे-छोटे गण ही आटविक (मेवासा ) राज्य बन गये । चन्द्रगुप्त मोर्य के पिता इनमे से ही थे । समुद्रगुप्त की इलाहाबाद की प्रशस्ति मे आटविक (आदिवासी मेवासे ) को विजित करने का उल्लेख मिलता है राजस्थान व गुजरात के आटविक राज्य मीना और भीलो के ही थे इस प्रकार वर्तमान ढूंढाड़ प्रदेश के मीना राज्य इसी प्रकार के विकसित आटविक राज्य थे।


खैराड़ प्रदेश


राजस्थान का इतिहास गौरवशाली रहा उसमे आदिवासी सर्वोपरि है । यहाँ के प्रकृति पुत्र आदिवासी इस धरा पर आदिमकाल से ही रहते आये है उनमे प्रमुख मीणा और भील है । यह प्रदेश कई उप क्षेत्रो मे विभिक्त था - मेवाड़,मारवाड़,मेरवाड़ा,ठढूढाड़, हाड़ोती और खेराड़ । उनमे अपनी वीरता के लिए खैराड़ का विशेष महत्व है । खैर वृक्ष की बहुलता के कारण इस क्षेत्र का नाम खैराड़ बताया जाता है । भाषाविज्ञान के अनुसार खैर+राष्ट्र= खैराष्ट्र=खैराट अन्त मे ‘ट ‘का स्थान ‘ड़’ के लेने के बाद नामाकरण " खैराड़" हुआ मीणा आदिवासियो की बहुलता के कारण इस प्रदेश को " मीणा खैराड़ " भी कहा जाने लगा बनास नदी के दोनों ओर के प्रदेश को खैराड़ प्रदेश कहा जाता है जिसके अन्तर्गत - प्रमुख गाँव लुहारी कला, उमर गाँव,सरस्या,गाड़ोली,ईटूड़ा, देवा खेड़ा, बासनी,टिकड़,गौमरगढ़,हिण्डोली, देवली का कुछ क्षेत्र,माण्डलगढ़ और जहाजपुर के आस पास का क्षेत्र आता है अर्सकीन के अनुसार आदिवासियो के दो प्रमुख क्षेत्र है- एक तो छप्पन के पहाड़ और दूसरे खैराड़ का क्षेत्र यहाँ के निवासियोँ को कर्नल टॉड ने इन्हे " सच्चे प्रकृति पुत्र" कहा है व सम्मान देने वालो को सम्मान देने की प्रबल भावना यहाँ की धरोहर कहा है वीरता व शौर्य वहाँ के आदिवासियो की रग रग मे बसी उनकी धरोहर है । पहाड़ी और अनपजाऊ होने कारण ये पूर्णतः आयुध्दजीवी थे युध्द ही इनकी आजिविका का साधन रहा है यह विभिन्न प्रतेशो से आये आदिवासियो का संगम स्थल है वीर विनोद के लेखक श्यामल दास के अनुसार मेवाड़ के जहाजपुर इलाके (खैराड़) मेँ मोठीस तथा पड़िहार मीणाओ की बहुलता है मीणो के 12 मेवासियो मे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोंझों खोखर का विशेष नाम है । मध्यकाल मे बनास नदी के दोनो ओर बसे खैराड़ प्रदेश में " बरड़" गोत्रिय मीणा आदिवासियो का राज्य था जिसकी राजधानी गोमरगढ़ थी इस राज्य को महाराणा प्रताप के भाई जगमाल जो अकबर की सेवा मे चला गया था जहाजपुर परगना जागीर मे मिलने पर छीना यह 1584 के आस पास की घटना है माधजी सिन्धिया के जहाजपुर क्षेत्र मे आने पर की सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । अंग्रेजो व रियासती शासको के दमन व अधिकारो मे की कटौती को लेकर भुवाना पटैल व गोकुट पटेल के नेतृत्व मे 1855 मे मीणाओने विद्रो किया |वीर विनोद मे उल्लेख करते हुए श्यामलदास ने लिखा है कि खैराड़ के मीणा बहुत बहादूर होते थे और लड़ाई के समय भीलोँ की तरह डू डू डू डू करके डूडकारी करते है तथा ये अपने पूर्वज 'माला' जुझार की सौगन्ध खाते है 1891 मे मेवाड़ मे मीणो की संख्या 20032 है " | मेवाड़ महाराणा राजसिह के समय ई 1662 मेँ खेराड (भीलवाड़ा) के मीणो ने विद्रोह किया उनको दबाया समझौते मे 1667 मेँ मीणो के सरदार पीथा को जाड़ोली(जाजपुर ) की स्वतंत्र जागीर दी गई ताकि मीणा शान्त हो जाए और शासन पर आस्था उत्पन्न हो सके । ये सब घटनाए साबित करती है कि राजस्थान के आदिवासियो ने निरन्तर स्वतंत्रता युध्द जारी रखा है चाहे सत्ता कोई भी हो क्योकि वो जानते है कि हमारे पुरखे इस धरा के मालिक और मूलनिवास है |.... year 1809 में महादजी सिंधिया की मराठा का नेत्रित्व कर रहे Mr. brrautan ने अपने पत्रों में आदिवासी मीणा का उअल्लेख करते हुए लिखा है की -खैराड़ प्रदेश जहाजगढ़ (जहाजपुर ) के मीणा सेनिको का दस्ता मराठा केम्प में आया .हुवा था मैंने एक सेवक भेजकर उन्हें बुलाया वे 13-14 व्यक्ति थे उन्होंने खुशनुमा मिजाजसे प्रवेश किया और मुझे अपने रीती रिवाजो अनुसार आदर दिया वे तीर- धनुष और कटर जैसे हथियार लिए थे उनकी पगड़ी काफी ऊँची बंधी हुई थी और शीर्ष पर बोझा पक्षियों के पंख लगे थे .सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । . (their turban very high ornomented on the top with bunch of feather of a species of curlew,called Bojha).......ukt chitra usi kherad (Jahajpur) ke meena sardar ka hai ...jise Mr.Brrautan ne banaya tha |उदयपुर राज्य के जहाजपुर परगने अर्थात खेराड के मीणाओ ने 1851 में अंग्रेजो की नई राजस्व व्यवथा के खिलाफ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के नेतृत्व मे विद्राह कर दिया इस क्षेत्र के मीणा राजसता से मुक्त थे केवल महाराणा मेवाड़ की प्रतिकात्मक सत्ता स्वीकार करते थे मीणा व भीलो के विद्रोह केवल अंग्रेजो के विरुद्ध ही नहीं थे बल्कि वे सम्बंदित राज्यों के भी विरुद्ध थे जिसके माध्यम से अंग्रेज अपनी नीतियों को कार्यान्वित करवा रहे थे शौषण और अवैध धन वसुली के खिलाफ मीणों ने बगावत कर दी विद्रोही मीणाओ ने न केवल राजस्व अधिकारियो व महाजनों को लुटा बल्कि अंग्रेज छावनियो को भी लुटा । उनके दमन के लिए उदयपुर से एक सेना मेहता अजित सिंह के नेत्रत्व में शाहापुरा ,बनेडा ,बिजोलिया, भेसरोड़, जहाजपुर एवं माँडलगढ़ के जागीरदारों की सेनाये साथ लेकर पहुची एजेंट टू गवर्नर जनरल इन राजपुताना के कहने पर जयपुर, टोंक, बूंदी राज्यों की सीमओं पर चोकसी बड़ा दी ताकि जहाजपुर के मीणाओ को अन्य मीणाओ की सहायता न मिले |उदयपुर की सेनाओ ने छोटी लुहारी व बड़ी लुहारी नामक गाँवो पर आक्रमण किया जो मीणा मुखियाओ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के गाँव थे सेनाओ ने दोनों ही गाँवो को नष्ट कर दिया तथा मीणे सपरिवार मनोहरगढ व देवखेडा की पहाडियों में जाकर मोर्चा लिया वहा उन्होंने रक्षात्मक स्थिति प्राप्त कर ली थी इसी बीच जयपुर ,बूंदी ,टोंक राज्यों से तमाम प्रतिबंधो के उपरांत भी लगभग 5000 मीणे जहाजपुर के मीणो की सहायतार्थ पहुच गए थे मीणाओ ने बड़ी बहादूरी से ये युध्द लड़ा अंत में रियासतो व सरकार की फौजे हारकर पीछे हट गई उनके 57 सिपाही मीणो के हाथो मारे गए .यह मीणाओ की बहुत बड़ी सफलता थी मीणा आदिवासियो मे 12 प्रसिध्द मेवासी हुए है उनमे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोझों खोखर का विशेष महत्व है यहाँ मेवास और मेवासी शब्दो का अर्थ स्पष्ट करना भी उचित होगा । मेवास- मेवास वह दुर्गम पहाड़ी, कन्दराओ के ऊपर प्रकृति के बीच बसा गढ़ होता है जहां तक पहुचना आदिवासियो के अलावा और किसी अन्य का पहचना सभ्भव नही । मेवास के अधिपति को ' मेवासी ' कहा जाता था अर्थात मेवासी ऐसे स्थान के अधिपति से है जो किसी शासक के अधीन न रह कर स्वतंत्र विचरण करता हुआ अपनी स्वतंत्र सत्ता का प्रदर्शन करता था और अपने निजी सैन्य बल से शासक माने जाने वाले लोगो को भयभीत किये रहता था । ऐसे मेवासी को वश करना अत्यन्त कठिन कार्य समझा जाता था । पीथा मीणा भी इस क्षेत्र का एक प्रसिध्द व्यक्ति था | सरस्या गाँव (जहाजपुर) के श्री राम मोठीस ने पिँजरे मेँ नाहर (शेर) को कैद कर भाट को दान दिया । 1857 की क्रांति मेँ तात्या टॉपे जब खैराड़ क्षेत्र मे आये तो यहाँ के मीणा आदिवासियो ने भरपूर सहायता की और कई युध्दो मे अंगेजो को हराया । 1851- 60 के आस पास यहाँ के मीणाओ को बड़ी संख्या मे फौज मे भर्ति किया । मेवाड़ के महाराणा के कहने पर इस क्षेत्र का बलदेवा मीणा (बलदेव सिंह) ने 3000 मीणा फौज मे भर्ति कराया जिसके बदल महाराणा ने दरबार मे बुलाकर सम्मान व इनाम के रूप मे 3000 चांदी के कलकार देने की पेशकश पर बलदेवा मीणा ने कहा कि अगर आप देना ही चाहते हो तो मेरी कौम का पुराना सम्मान "सिँह" जो छीन लिया गया वापिस लौटा दे तब महाराणा ने ऐसा आदेश प्रसारित कर दिया बलदेवा अब बलदेव सिह हो गये । फौज मे भर्ती होना इस क्षेत्र की परम्परा है भारत को स्वतंत्र करने के आश्वसन के बाद यहाँ के लोग अग्रेज फोज के रुप प्रथम व द्वितिय विश्व युध्द मे लड़ने गये बहादूरी से युध्द लड़ा अंग्रेजो को विजय दिलाई कई मीणा सरदारो को वीरता पुरस्कारो से नवाजा गया सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज मे यहाँ के कई सैनिक थे । सुभाष चन्द्र बोस के ड्राईवर भी इसी क्षेत्र के उमर गाँव के थे यहाँ के गाड़ोली,लुहारी,बासनी ओर उमर गाँव के सैकड़ो मीणा आदिवासी लोग भारतीय सेना मे है । उमर अकेले गाँव के अब 7000 लोग फौज मे भर्ति हो चुके । यहाँ के लोग प्रथम व द्वितीय विश्व मे लड़े थे 16 लोगो का रिकार्ड अब तक है जिनकी कई विधवाये अब भी जीवित है जिनको पेशन भी मिलती भारत सरकार से । यह एक मात्र गाँव है जिसमे से सर्वाधिक लोग भारतीय फौज मे है इस गाँव को तो भारतीय फौज गौद भी ले रखा है इस क्षेत्र को आदिवासियो की वीर धरा कहा जाये तो अतिश्योक्ति नही होगी

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