महाराष्ट्र राज्य से राजस्थान तक: महाराष्ट्र

 महाराष्ट्र राज्य से

राजस्थान तक: महाराष्ट्र


परदेशी राजपूत (राजस्थान के मीना )


महाराष्ट्र में भी परदेशी,राजपूत, नाम से राजस्थान से करीब 400 साल पहले 1600-1700 ई० के बीच राजा मानसिंह, महासिंह, भावसिंह और जयसिंह से साथ सैनिको के रूप में दक्षिण के खानदेश, अहमद नगर, बीजापुर, और गोलकुंडा विजय करने गए जयपुर के राजाओ को वहा की सुबेदारी मिलने पर लम्बे समय रहने के गए सेनिक व सहयोगी वही बस गए जय सिंह के देहांत के बाद मुग़ल सूबेदारों ने आर्थिक संकट के कारन सेना कम कर दी उन सैनिको को शिवाजी मराठा ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए वो ही मीणा लोग परदेशी राजपूत है | महाराष्ट्र में बसे परदेशी राजपूत (मीना) वहां आपस में कावच्या, भातरया,और सपाटया नाम से एक दुसरे को संबोधित करते है | संयोगवश यह नाम राजस्थान में भी प्रचलित है | जब यहाँ के मीना महाराष्ट्र में गए तब आज का पचवारा,नागरचाल, खैराड,तलेटी, बवान्नी, बयालिसी, के क्षेत्र को कवाच्या कहते थे इसलिए महाराष्ट्र में कवाच्या शब्द का प्रयोग हुवा | मेवात (अलवर-भरतपुर), डूंगरवाड, काठेड (नरौली बैर भरतपुर),जगरोटी (हिंडौन करोली), आंतरी,नेहडा (अलवर), डांग (करोली धोलपुर ) इस क्षेत्र को 350-400 वर्ष पूर्व भातर प्रदेश कहते थे जिसकी राजधानी माचाड़ी थी राजस्थान के भातर प्रदेश निकले मीना माहाराष्ट्र में भातरया, बहदुरिया (करोली की प्राचीन राजधानी बहादुरपुर थी ), बहतारिया, कहलाते है | सपाट (सपाड) प्रदेश से गए हुए राजस्थान के मीना लोगो को मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में सापडया (सपाट्या) कहते है | खंडार तहसील का क्षेत्र,श्योपुर का क्षेत्र, चम्बल, और पार्वती नदी के बीच का क्षेत्र और समस्त हाड़ोती(कोटा,बारां,झालावाड) सापडया क्षेत्र कहलाता था | ये लोग महाराष्ट्र के 15 जिलों की 35 तहसीलों के लगभग 325 गाँवो में रहते है | हम इनका इतिहास ढूंढ रहे है कुछ दस्तावेज भी मिल रहे ...राम सिंह नोरावत जी भी 1949 में वहा गए लोगो से मिले जिसका विवरण अपनी डायरी में लिखा और उस समय की मीणा वीर पत्रिका में छपवाया ओरंगाबाद में मीणा खोखड़ सरदार रामो जी खोखड़ के युध्द में शहीद होने पर उनके नाम से गाँव बसा हुवा है जो औरंगाबाद की एक कोलोनी बन चूका .|.खंडिप गंगापुर के उदय सिंह लकवाल वैजापुर /बीजापुर के युद्ध में वीरगति पाई थी जागा उनके परिवार का महाराष्ट्र से संवत 1730 में आना बताते है जिनको उस गाँव में आज भी मराठा थोक कहते है | कुरहा (अमरावती,बरार ) महाराष्ट्र में एक प्राचीन पपलाज माता जी का बहुत बड़ा मंदिर है पास ही 4 किलोमीटर दूर तिउसा गाँव में एक प्रसिद्ध ताजी गोत्र का मीना परिवार के लोग रहते है जिसमे नारायण सिंह ताजी ख्याति प्राप्त रहे है उनके वन्सजो का निकास भगवतगढ सवाई माधोपुर से होना बताते है करीब 300 साल पूर्व यहाँ से ले जाकर कुरहा में माता जी की स्थापना की गई है नारायण सिंह ताजी की शादी भी करीब 100 साल पहले जयपुर के किसी बड़दावत गोत्री मीणा के यहाँ हुई थी | विट्टल सिंह जी डाडरवाल और प्रताप सिंह जी पैडवाल अपनी वन्सवाली जानने डिगो लालसोट के जागाओ के पास 50 साल पहले आये थे | हम अपना वजूद भूले हुई समाज के लोगो को अपना वजूद जानने में सहयोग कर रहे है | हम 2004 से निरंतर उनके संपर्क में है | 6-2- 2013 व फ़रवरी 7-9 मार्च 2014 को हम महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले की गंगापुर तहसील के कुछ गाँवो में भी जाकर आये है पुराने लोगो का पहनावा,भाषा रीतिरिवाज सब अपने जैसे ही है उनको अपनी मूल भूमि से जोड़ने के लिए सभी का सहयोग अपेक्षित है | सभी के प्रयास से राजस्थान में महाराष्ट्र से अब तक 18 शादिया लालसोट, गंगापुर, निवाई, उनियारा, नैनवा, कोटा, बोंली, मालपुरा, जयपुर में हो चुकी है |


किसी समय प्राचीन राजस्थान के अधिकांश हिस्से पर मीना राजाओ का अधिकार था आमेर उनमे प्राचीन था जो मं गणों का संघ था कच्छावा राजपूत नरवर प्रदेश मध्यदेश से जाकर आमेर धोखे से मिनाओ से छिना काफी लम्बे समय तक मीना संघर्ष करते रहे आखिर भारमल कछावा के अकबर की अधीनता स्वीकार करने और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के बाद उसकी शक्ति बढ़ गई थी तथा मीना पूर्णरूपेण अपनी शक्ति खो चुके थे फिर भी निरंतर संघर्ष जारी रखे हुए थे परन्तु इस मनोमालिन्य को पूरी तरह से मिटने के लिए भारमल ने कूटनीति का प्रयोग किया तथा मीनों को जागीरे ,राज्य का पुलिस सुरक्षा प्रबंध ,खजांची,सेना के कई प्रमिख ओदे,तोपखाना आदि की जिम्मेदारी दी तह कई किलों नाहरगढ़,जैगढ़ की किलेदारी भी दी 21 जागीरे और प्रमुख दरबारी सरदारों में भी स्थान दिया था उस समय जागीरदार राजा को सेनिक सहायता दिया करते थे यहाँ यह कहा जा सकता है की इस बहादुर और लड़ाकू कौम मीना के सेनिक दस्ते भी राजा मानसिंह की सेना में थे | क्योकि मुग़ल दरबार से आदेश मिलने पर राजा मानसिंह ने एक विशेष सेनिक दल भर्ती किया था जिसमे मीना और मेवाती थे | .6 जनवरी 1601 ई० में असीरगढ़ पर पूर्ण विजय मिलने पर अकबर ने दानियाल को दक्षिण का जिसके अंतर गत खानदेश,बरार,और अहमद नगर का कुछ भाग था जिसकी राजधानी दोलताबाद थी दिया |


दानियाल की मृत्यु 1604 के बाद मानसिंह 1609 में जहागीर के समय प्रधान सेनापति शहजादा परवेज के सहयोग में गए 5 साल की सेवा के बाद 6 जुलाई 1614 कोएलिचपुर में उनका देहांत हो गया | उनके बाद गडा और दौसा के जागीरदार कुवर महा सिंह को भेजा गया 20 मई 1617 में बरार के बालापुर में इनका भी देहांत हो गया यहाँ यह बताना भी उचित होगा की जब महासिंह को दौसा की जागीर मिली तो उसकी सेना में दौसा क्षेत्र के लोग अवश्य होंगे खोकड़ सरदार रामो जी महासिग की सेना में प्रमुख ओहदेदार रहे होंगे संभव यह है की खोखड सरदार के नेत्रित्व में हजारों मीना और मेवाती सेनिक दक्षिण में महासिंह के साथ गए बरार के बालापुर में जहाँ महासिंह जी का देहांत हुवा वह स्थान अकोला से 50 किलोमीटर और अमरावती से 100 किलोमीटर ही है जहा कई गाँवो में मीना परदेशी राजपूत के नाम से आज भी बसे हुए है साथ ही औरंगाबाद(प्राचीन खिड़की) में खोखडपूरा(अब एक कोलोनी) और भाव सिंह पूरा गाँव भी है जो संभवत मीना खोखड सरदार और राजा मान सिंह के पुत्र भाव सिंह जिन्हें महा सिंह के बाद दक्षिण में नियुक्ति मिली का देहांत भी बालापुर में सन 1622 ई० में हुवा था की यादगार में बसाये गए होंगे | महासिंह और भाव सिंह के समय भी मीना 10 से 1000 तक के मनसब थे तोपखाना हजुरी तो पूरी तरह मिनाओ के ही अधीन था | फिर अगला दस्ता जयसिंह के साथ गया लगभग 1656 ई० में | जो लोग 1609 में गए थे वो वापिस घर नहीं आये बाद में गए वो भी उनसे मिल गए |


दक्षिण में गए मिनाओ ने कई विजय प्राप्त की और अदम्य साहस का परिचय दिया | बाद में जयसिंह के लोटने व मुगलों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने पर इन सेनिको को निकला गया जिन्हें शिवाजी ने अपनी सेना में भर्ती कर लिए शिवाजी ने उन्हें पद और ओहदे दिए जमीने दी | मिनाओ की गुर्रिला युद्ध निति आगे जाकर शिवाजी महाराज की प्रमुख युद्ध रणनीति बन गई | मराठे और मीना साथ मिलकर मुगलों से लडे | भाईचारा बढ़ा और ये वही के होकर रह गए ।

वि.के.मीणा


जयपुर महाराजा समय-समय पर मीणा जमींदारों से सैनिक सहायता लेते रहते थे। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उससे भी आगे दक्षिण में अधिकतर मीणों का निष्क्रमण जयपुर महाराजा के सैनिक अभियानों के दौरान ही हुआ था। वहा¡ उन्हें जमींदारिया¡ प्रदान कर बसाया गया था और इसी कारण वे वहा¡ `परदेशी राजपूत` कहलाने लगे थे। यह सब इतने विस्तार के साथ इसलिए लिखा गया है कि टोडाभीम परगने में जोरवाल मीणा जमींदारी का अस्तित्व हृदयगंम हो सके।

टोडाभीम और बामवास क्षेत्र के मीणां जमींदारों के शक्ति-प्रदर्शन के अनेक किस्से सुनने को मिलते हैं। गंगािंसह द्वारा लििाख्त `यदुवंश` (प्रथम भाग) में बामनवास के मीणा सरदार का जिक्र है जो अपने क्षेत्र का मुखिया था। उसने अपने इलाके का लगान जयपुर दरबार को नहीं चुकाया और घोषणा कर दी- `जो उसे मल्लयुद्ध में हरा देगा, उसे वह लगान देगा। महाराज यदि लगान वसूली को भेजते हैं तो किसी अकेले को भेजें जो मुझे मल्लयुद्ध में हराकर लगान ले जाये।` सन् 1756 के आसपास भरतपुर राज्य के पथैना के ठाकुर अजीतसिंह तत्कालीन भरतपुर नरेश से मनमुटाव के कारण जयपुर आ गये। बामनवास के मीणा सरदार को अजीतसिंह ने मल्लयुद्ध में पराजित किया। महाराज जयपुर ने खुश होकर बामनवास की सवा लाख की जागीर अजीतसिंह के नाम कर दी। लेकिन सात साल बाद अजीतसिंह अपने गृह राज्य में लौट गये। 

अलवर जिले की थानागाजी तहसील के गा¡व हमीरपुर में लाला नीमवाल द्वारा निर्मित तीन चौक की हवेली और घुड़साल देखने से पता चलता है कि अठारवीं सदी में जयपुर रियासत में शक्तिशाली मीणा जमींदार थे। मीणों के अनेक बड़े-बड़े गा¡वों में मीणा सरदारों के पास रह¡कड़ा, रामचन्दी (छोटी तापें) तथा तोपें रहती थी।। कुछ गा¡वों के कब्जे में आज भी ये देखी जा सकती हैं। 

भगवान अद्युतानन्द गिरि द्वारा सन् 1942 में लिखित बारा मेवाशियों का संक्षिप्त इतिहास में टोडाभीम के जोरवाल (जुणवाल) तथा बामनवास के लोदवाल मीणों के सम्बन्ध में लिखा है - 

`जुणवाल मीणा राजपूत निजामत हिण्डोन के परगने में मशहूर हैं। पहले जमाने में राजा की तरफ से काफी मुर्तबा हासिल कर चुक हैं जो खानदान के बगदाव में मशहूर है। ।`

`बामणोस में लोदवाल काराडे (का¡टिया) गोत के मीणा राजपूत रहते हैं और इनको भी राज की तरफ से अच्छे मुर्तबा में शामिल किये जाते हैं। पा¡च नाम के गोत के मीणा राजपूतों को बादशाही जमाने से पालकी कडवाई की मंजूरी हुई।

टोडाभीम पर कछवाहों के आधिपत्य से पूर्व, प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार उस पुराने जमाने में टोडाभीम 300 खेड़ाओं (गा¡वों) की राजधानी थी और तब टोडाभीम का जोरवाल मीणा मुखिया उन 300 खेड़ाओं से चौथ वसूल करता था - 

जोधा, शहर टोडा बैठ्यो,

तीन सौ खेड़ा की चौधराहट लीन्हीं।

तीन सौ तिलक टोड़ो बण्यो,

कलसड़े कामन्ना भेंट आयी। 

(सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

इस तथ्य को पुराने लोग आज भी छाती ठोककर उजागर करते रहते हैं कि सिकराय-टोडाभीम-निठार के बीच का लगभग 40-50 किलोमीटर का क्षेत्र पुराने जमाने में जोरवाल मीणाओं के अधीन था। सिकराय के जोरवाल मीणा परिवारों के लोगों को आज भी जागीरदार पदवी के साथ सम्बोधित किया जाता है। सिकराय का श्यामा जोरवाल, टोडाभीम का जोधा और ऊदा जोरवाल तथा निठार का रीठा जोरवाल अपने समय के अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति थे। `कुआल का पुरा` का जयकिशन पटेल और जिन्सी का पुरा भांवरा का जिन्सी पटेल बामनवास के प्रसिद्ध जमीदार थे।

टोडाभीम तथा अन्य स्थानों पर राजपूतों का प्रभावशाली नियंत्रण हो जाने पर राजपूत शासकों ने चौथ वसूली के लिए प्रभावशाली जोरवाल मीणा सरदारों को अपने-अपने क्षेत्र में चौधीर की सम्मानित पदवी प्रदान की। टोडाभीम का चौधरी हाथीबन्द था। अपने इलाके में जाने के लिए हाथी की सवारी का इस्तेमाल करता था। चौधरी को पलाकी भी मिली हुई थी। कचहरी में जाने के लिए वह पालकी का इस्तेमाल करता था। हाथी और पालकी का सारा खर्चा राज्य के जिम्मे था। टोडाभीम में :आमिल´ नामक पदाधिकारी रहता था। वह जयपुर महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में इस क्षेत्र के लगान सम्बन्धी कार्योको देखता था। सन् 1693 के आसपास जयपुर नरेश बिशनसिंह द्वारा टोडाभीम में नियुक्त आमिल का नाम चूड़ामलदास था। 

जब-जब भी किसी आमिल या जागीरदार ने इस क्षेत्र के जोरवाल चौधरी के अधिकारों को कम प्रयास किया, तब-तब जोरवाल चौधरी अपने भाई-बन्धुओं की सहायता से उनके खिलाफ संघर्ष छेड़ देते थे। एक ऐसी ही खींचातानी में गज्जू जोरवाल के पुत्र मालदे ने अपने साथियों को लेकर अपने क्षेत्र के ठाकुर के गढ़ को घेर लिया। इस संघर्ष में इाकुर हार गया। मालदे ने उसे पकड़ लिया और सब मिलकर उसके लिए सजा तजबीज करने लगे। गम्भीर स्थिति देखकर ठकुरानी बाहर आई और मालदे से ठाकुर के प्राण-रक्षा की गुंहार की। इसके ऐवज में ठकुरानी ने मालदे की दासी तक बनना स्वीकार कर लिया। इस सम्बन्ध में निम्न पद्य प्रचलित है -

तरकश कछनी का¡छ के चार वाल घेरी।

अबके बखस दे गज्जू के मालदे,

मैं चरणन की चेरी

(सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

[25/12 3:45 pm] मीणा प्रकाश चंद गोठवाल: मीणा राजपूत

सिकराय, टोडाभीम हिण्डौन और बामनवास सहित समूचा पचवारा क्षेत्र पुराने जमाने में मीणाओं का गढ़ रहा था। इस क्षेत्र के प्रशसन पर कछवाहों की पकड़ बड़ी मुश्किल से हो पाई थी। उससे पहले इस लम्बे-चौड़े इलाके पर एकछत्र मीणाओं का वर्चस्व रहा था। तब और उसके बाद तक मीणाओं का यहा¡ राजपूत कहा जाता था, राजपूत माना जाता था और राजपूत बताया जाता था (मीणा राजपूत)।

टोडाभीम के जोरवाल मीणा जमींदार को शासक-प्रशसक की सारी शक्तिया¡ प्राप्त थीं, जैसे दीवानी, फौजदारी, मालगुजारी, पदनाम (रावत या चौधरी), निशान, नक्कारे आदि-आदि। बादशाह अथवा महाराजा की ओर से उन्हें वर्ष में दो बार नियमित रूप से शिरोपाव (पगड़ी) और भेंट मिलती रही थी जो उनके सामन्त होने का साफल सबूत है।


वि.के.मीणा


लालसोट:-


बहुत कम लोगों को ज्ञात है कि देश के महानतम बौध्द स्तूपों मेँ कभी लालसोट (जिला दौसा राजस्थान) के बौध्द स्तूप की भी गणना हुआ करती थी । आज जहां मुसलमानों ने कब्रगाह बना रखे है और जिसे इमाम बाड़ा नाम दे रखा है । किसी समय महात्मा गौतम बुध्द के पावन अवशेषों की स्मृतियों का विशाल बौध्द स्तूप था । इस स्थान पर बने विशाल बौध्द स्तूप का मुख्य भवन तो नष्ट हो चुका है परन्तु कई बड़ी बड़ी छतरियों के भग्नावशेष अभी भी दिखाई देते है ।


ब्रजमोहन द्विवेदी ने लालसोट के इतिहास मे इस स्थान के बारे मे लिखा है । कुछ वर्ष पूर्व श्रीलंका के भारत स्थित राजदूत कुछ प्राचीन दस्तावेजों की पाण्डुलिपियों सहित लालसोट आये थे । इस प्रसिध्द बौध्द स्तूप की वर्षोँ से उपेक्षा और दुर्दशा देखकर उन्हें अपार मानसिक पीड़ा हुई थी । लालसोट में अशोक कालीन छतरी भी है । लालसोट मेँ बौध्द स्तूप मिलने से मान्यता स्थापित होती है कि पिप्पलिवन के मौर्यो ने बुध्द की चिता भस्म के अवशेषो को रेढ (निवाई के पास जिला टौँक) जहां बुध्द धर्म से संबंधित पात्र मिले है । यहाँ से चिता भस्म का कुछ अंश या सम्पूर्ण अंश तत्कालिन समय मे लालसोट में स्थानान्तरित हुए । संभवतः पिप्पलिवन के मौर्यो ने चिता भस्म के अंशो को बाटकर एक से अधिक स्थानों पर तत्कालिन समय अथवा कालान्तर में बौध्द स्तूप बनाये गये थे । राजस्थान के जिला दोसा के भांडारेज जहाँ भाभड़ा गोत्र के मिनाओ का लम्बे समय तक शासन रहे मेँ भडान माता के मंदिर के प्राँगण मैँ बौध्द स्तूपों के मुंडेर तथा स्तम्भ मिले है । भांडारेज से प्राप्त बौध्द स्तूपोँ के पुरावशेष लालसोट के समकालिन है ।उक्त सभी क्षेत्रो के मीना प्राचीन शासक रहे है मौर्यो के पुर्वज महाभारत कालिन राजा मोरध्वज(जिसे मीनावंशी शासक मानते है) की मोरा नगरी या मोरागढ़ नादौती जिला करौली राजस्थान मे है इसी प्रकार मीना आदिवासियो की प्राचीनतम राजधानी विराट नगर का भी महात्मा बुध्द व मौर्यो का गहरा सम्बंध है मीना मोरा माता को कुल देवी भी मानते है और उनमेँ मोर,मोर्य,मोरड़ा,मोरेजा,मुराडा,मुराडिया कई गौत्र भी मोर्यो से सम्बन्ध स्थापित करते है ।


बौध्द धर्म साहित्य में मौर्यों के संबंध में तीन स्थान ज्ञात होते है - 1- पिप्पलिवन, 2- न्योग्रधवन व 3- मोरिय- मोलिय नगर इनमे प्रथम व तीसरे स्थान की स्थिति राजस्थान मे पाई जाती है । पिपरावा के समीप कपिलवस्तु की समीपता और प्राप्त अस्थि कलश पर शाक्यो द्वारा बौध्द स्तूप बनाये जाने का वर्णन मिलने से पिपरावा को मौर्यो का पिप्पलिवन-पिप्पलिवाहन होना मिथ्या प्रमाणित है जनार्दन भट्ट ने बुध्द के अंतिम संस्कार व अस्थि बटवारा के प्रसंग में जो कुछ लिखा है वह पिप्पलिवन के मौर्यो के मूल स्थान को जानने के लिए महत्तपूर्ण साक्ष्य है ।डॉ. प्रहलाद मीणा ने अपने शौध्दपूर्ण लेख " मौर्य वंश मीन वंशी मीणा क्यों और कैसे ? " मे मोरिय ग्राम को जिला करौली के मोरागढ़ को मानते है । एस पी सिँह ने भी लिखा है कि बुजुर्गो के अनुसार मोरा ग्राम राजा मोरध्वज से भी बहुता प्राचीन है आज का मोरा तो पहाड़ की तलहटी मेँ बसा हुआ है किन्तु प्राचीन मोरा गाँव पहाड़ के ऊपर बसा हुआ रहा है जिसके अवशेष आज भी वहां बिखरे पड़े है वहाँ मीणाओ की एक शाखा की कुल देवी मोरा माता का भी मन्दिर है ।साथ ही महात्मा बुध्द के अंतिम संस्कार व अस्थि बटवारा प्रसंग के अध्ययन से स्पष्ट होता है की पिप्पलिवन आठ जातियों के राज्यों से दूर दराज के क्षेत्र मे था ।


डॉ. प्रहलाद के मतानुसार पिप्पलिवन की भौगोलिक स्थिति मौरेल नदी के तटवर्ती जिला टोंक की निवाई तहसील अन्तर्गत होनी चाहिए मौरिल नदी वर्तमान में जिला दौसा के बड़ा गाँव बंधा से होकर हेमल्यावास व कूपावास ग्रामों के पास होती हुई लालसोट तहसील की पश्चिमी व दक्षिणी भाग की सीमा बनाती हुई सवाईमाधोपुर जिले मे प्रवेश कर जाती है मल्ला मरमट मीणा के 1300 वर्ष पुराने गाँव मलारना चौड़ के पास से होती हुई मलारना स्टेशन से 10 किमी दूर हाड़ोती नामक स्थान से बनास नदी मे मिल जाती है जिला जयपुर की चाकसू तहसील व जिला टोंक की निवाई तहसील का सीमा क्षेत्र मौरेल को स्पर्श करता है । एक साम्यता मौरेल नदी के बहाव क्षेत्र के आस पास के क्षेत्रों में भी मोरों की बहुलता थी । ऐसे ही पिप्पलिवन मे भी मोरों की बाहुल्यता थी । निवाई का पहाड़ रक्तांचल पर्वत कहलाता है । इस पहाड़ की तलहटी मे मल्ला मरमट की गौत्री लोगो का हजारों साल पुराना गांव बरथल स्थित है ।जो मरमट गोत्र के मिनाओ का निकास गाँव माना जाता है इस पर एक ऐतिहासिक विरुदावली जनमानस मे प्रचलित है -


" पाल पिपलि पहाड़ कौन हलायौ पान । हाड़ा मरमट जन्मीया बाज्या ढोल निशान ॥ "


पाल पिपलि पहाड़ की तलहटी में पिप्पलिवन होना चाहिए निवाई क्षेत्र में पिप्पलि झिराना व पिराना प्राचीन ऐतिहासिक महत्व के गांव है । निवाई क्षेत्र के रेढ़ गांव से तो बौध्दकालिन अवशेष मिले है । पिप्पलिवन में मयुरों(मोरा) की बाहुल्यता, मोरेल नदी के तटवर्ती स्थानों पर प्राचीन काल में मयुरोँ की बाहुल्यता, जिला टौँक की निवाई तहसील में पाल पिप्पलि पहाड़ होने की संभावना,डॉ के एन पुरी द्वारा पुरावशेषों के आधार पर रैढ मेँ बुध्द अस्थियों के अवशेष होने का अनुमान लगाना, मोरण व राजा मोर ध्वज का प्राचीनतम मोरागढ़ नगर होना ,मीणो मे मोर,मोरिया,मोरड़ा,मोरी मोरिजा,ताजी और गौत्र होना,अन्तिम मौर्य सम्राट चित्रांगद के वंशज राज राजा मान मोर को मीना मानना , लालसोट,भाण्डारेज में बोध्द स्तूप का होना आदि सम्मिलति साक्ष्यों से पिप्पलिवन मोरेल नदी के समीपवर्ती क्षेत्र मे होने की मान्यता स्थापित होती है । मौर्य वंश प्राचीनतम मीन गणधारी लोगो की एक शाखा थी ।


गंगापुर और सवाई माधोपुर के बीच में खेड़ा की डूंगरी के नीचे खेड़ा बाढ़ गांव बसा हुआ था इस गांव से निकले मौर-मोरये,मोरड़ा गौत्र के मीणाओ ने मोराड़ा(मुराड़ा) गाँव बसाया मुराड़ा गांव के नाम से मुराड़िया गोत्र का नामाकरण हुआ । रणथम्भौर के शासक टाटू मीणा और खेड़ा बाढ़ के मौर मौर्य मीणाओ मे संघर्ष की एक जन श्रुति जानकारी भी मिलती है सूरज जिद्दी ने अपनी पुस्तक "रणथम्भौर" में रणथम्भौर के पहाड़ो में मौर मोरड़ा,उषारा गौत्र के आदिवासी मीणों का बसा होने का उल्लेख राजा जैता के प्रसंग मे किया है । गढ़ मोरा के समीपवर्ती क्षेत्र मेँ वामनवास के समीप ककराला नामक ग्राम है जिसे कर्क मौर्य के वंशजो ने बसाया ।


कांकरवाल गोत्र के मीणा का निकास ककराला से बतलाया जाता है इनकी कुलदेवी मोरा माता है ककराला का प्राचीन नाम ककराल गिरी था रणथम्भौर के राजा हम्मीर के दिग्विजय अभियान में ककराल गिरि का नाम आता है लालसोट के शासक और प्राचीनकाल से इस क्षेत्र मे बसे घुणावत गौत्र के मीणाओ की कुल देवी भी मोरा माता है जिसका स्थान घुमणा गाँव मे है । लालसोट के पास देवली इनका प्राचीन गांव है । बाद मे लालसोट से निकले मीणा लालसोट्यो व लोटन कहलाये । इन सब तथ्यो से सिन्धुघाटी के मीन गणचिन्ह लोगो, तमिल व द्रविड़ शब्द नामधारी मीना लोगो,महाभारत के मत्स्यो(मच्छा,मीना,मीणा),वर्तमान मीणा आदिवासियो का बुध्द और मौर्य वंश से प्रगाढ़ और कुटुम्भिय सम्बन्ध जरुर रहा है ।


जैन मुनि मगन सागर ने सन 1937 मेँ लिखा है कि जैन लेखको ने चन्द्रगुप्त को मत्स्य राज्य के दक्षिण में स्थित मौर्य राज्य का राजकुमार माना है । मौर्य राज्य की राजधानी गढ़ मौरा थी अस्तु हमारी यह धारणा कि महाराज चन्द्रगुप्त मौर्य राजा मौरध्वज की वंशावलियों में से है और महाराज चन्द्रगुप्त भी मीनाओ की ही एक शाखा मे से है । इसमें कोई संदेह नहीं है । अतः मोर्य के बौध्द होने के कारण मीनाओ का भी महात्मा बुध्द से सम्बन्ध रहा है ।डॉ. सी एल शर्मा ने लिखा है कि रैढ़ (निवाई के पास) से प्राप्त पुरावशेषों से सेल खण्डी से बने बक्से एवं पालिसदार बौध्द धर्म से संबंधित पात्र है । इस प्रकार की वस्तुओ की प्राप्ति प्रायः उन्हीँ स्थानों पर हुई है जहां बोध्द धर्म का बोलबाला एवं प्रभाव था ।


डॉ. केदार नाथ पुरी ने भी इन पात्रोँ एवं बक्सों का अवलोकन कर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि इस प्रकार के पात्र उन स्थानों पर मिलते है जहां भगवान बुध्द की अस्थियाँ रखी जाती थी । अतः यह कहा जा सकता है कि मीणा आदिवासी बहुल यह मोरेल नदी का क्षेत्र बोध्द धर्म के प्रभाव व मोर्यो से सम्बन्धित प्रमुख क्षेत्र था ।पुष्कर से भी महात्मा बुध्द का तालुक रहा है लालसोट से लगभग 40 किमी दूर प्राचीन व ऐतिहासिक स्थल चाकसू (जयपुर) से बौध्द की प्राचीन प्रतिमा केवल सिर की आकृति के रुप मेँ ही मिली, सरिस्का वन क्षेत्र(मत्स्य प्रदेश) से भगवान बुध्द की प्रतिमा प्राप्त हुई है । डॉ. शंभू लाल दोषी व डॉ. नरेन्द्र व्यास ने लिखा है कि यह अवश्य है कि मीणों का उल्लेख 500 ई.पूर्व मिलता है । पर ये इस स्थल के इससे भी प्राचीन निवासी है ।


यह इतिहास बताता है कि दौसा के पूर्व 18 किमी मोरेल नदी का उद्गम इस नदी के किनारे मोरन शहर का विकास हुआ । यह शहर बाद मे चलकर राजा मौर्यध्वज के मौर्य साम्राज्य की राजधानी बना इस शहर के नागरिक मोरेजा या मोरेड़ा कहलायत थे । इसी वंश के किसी छोटे मुखिया के चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म हुआ जिसने एक विशाल मौर्य साम्राज्य की नीँव डाली और उसकी पुत्र अशोक महान ने उसे विशाल बनाया और बौध्द धर्म अपनाया जिसका प्रभाव उसके वंशज लोगो पर भी पड़ा । अशोक ने अपने प्राचीन वंश मीन (मत्स्य) की प्राचीन राजधानी विराट नगर (जयपुर) मे अपना सातवा धम्म शिला लेख लगवाया । बहुजन वर्ग मे बौध्द धर्म का काफी प्रभाव था पर पुष्यमित्र शुंग ने सब कुछ तहस नहस कर दिया बौध्द धर्म को संरक्षण देने वाले मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहदत्त का वध कर दिया । बृहदत्त के किसी वंशज चित्रांगद मौर्य ने चित्तोड़ की स्थापना कर राज्य स्थापित किया ।

 चित्तोड़(राजस्थान) के अंतिम राजा मानमौर जिसे कई ग्रन्थो मे मीना बताया गया है शायद इसलिए कि मौर्य वंश भी मूलतः मीन वंश की एक शाखा थी । राजा मानमौर ने बप्पा रावल को धर्म भानजा बना कर रखा परन्तु बाद मे बप्पारावल ने ही मानमौर की हत्या कर सत्ता ली जिसमे आगे जाकर कुभ्भा,सांगा,उदय सीँह व महाराणा प्रताप हुए । इस प्रकार मौर्य अपने मूल स्थान मे आकर वापिस मीन वंश मे ही विलिन हो गये मीन वंश बहुजनो से भी सम्बध रहा है पर आज मीन वंश से कई जातियाँ बन गई जो अपने मूल को भूल गई ।यह सब आप सब आदिवासी भाइयो का प्यार और समर्थन है जिसकी ऊर्जा से थोड़ा बहुत लिखकर आदिवासी युवाओ को जागृत करने का एक छोटा सा प्रयास कर पा रहा हुँ । यह सब हमारा सम्मिलित प्रयास है जो सतत बना रहे 

चाणक्य ने मोर्यकाल में आटविक लोगो को मौर्य सेना में भर्ती किये थे उसकी नीति थी की आदिवासियो को नाराज नही करना चाहिए इनके किले मजबूत होते है ये घनी आबादि मे बसे होते है नीडर बहादूर होते है, दिन दहाड़े युध्द के लिए तत्पर रहते है ये भारी हानी पहुचा सकते है इनको दुश्मनो से लड़ने में काम लेना चाहिए । उनको सेवा के बदले उपज का कुछ हिस्सा देना चाहिए ।


वर्तमान हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है कि सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने सुनाम व समाना के विद्रोही जाट व मीनाओ के संगठन ' मण्डल ' को नष्ट करके मुखियाओ को दिल्ली ले जाकर मुसलमान बना दिया ( E.H.I, इलियट भाग- 3, पार्ट- 1 पेज 245 ) इसी पुस्तक में अबोहर में मीनाओ के होने का उल्लेख है (पे 275 बही) इससे स्पष्ट है कि मीना प्राचीनकाल से सरस्वती के अपत्यकाओ में गंगा नगर हनुमानगढ़ एवं अबोहर- फाजिल्का मे आबाद थे । हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है । हरियाणा के फतेहाबाद जिले में जाँड वाला शोतर गाँव में मीणा के कम से कम 1000 वोट आज भी है उनका गोत्र कागन्स है | ऐसा कोई क्षेत्र न था जो मिनाओ के अधीन न रहा हो | सिंगली सारसोप गाँव सवाई मदोपुर में भी कांगस गोत्र के मीणा लोगो का रुतबा और दबदबा था |


कर्नल टॉड की पुस्तक के पृष्ठ-507-520तक उल्लेख है की उदयपुरवाटी सीकर के पास कासरग्ढ़ दुर्ग था जगाओ की पोथी से तथ्य सामने आते है की कांगस,कान्सरवाल गोत्र के मिनाओ की प्राचीन राजधानी थी ..उदयपुरवाटी का प्राचीन नाम कुसुम्बी अथवा काईस था इसके अंतर्गत चार भागों में विभक्त 45 गाँव थे वही छापोलीगढ़ भी था जो छापोला गोत्र के मिनाओ की राजधानी था यह क्षेत्र चौहानों और तोमरो ने मीणा आदिवासियों से धोके से छिना आमेर के राजा उदयकरण पड़पोते बालो जी ने 15 वी सदी में यह क्षेत्र अपने अधिकार में किया देवासी तथा कांसली (कासरग्ढ़) कुछ समय चंदेलो के अधीन भी रहे शेखा जी के पुत्र रायमल की सेवा से खुश होकर अकबर ने देवासी तथा कांसली के नगरो का अधिकार दिया रायमल के बाद कांसली और 84 गाँव उनके पुत्र तिरमल राव को मिले जयसिंग के समय सुजान सिंह छापोली गढ़ और दीप सिंह कांसली के सरदार बने चाँद सिंह सीकर के जागीरदार बने उनके देवी सिंह हुए उन्होंने लक्ष्मण सिंह को गोद लिया लक्ष्मण सिंह ने अधीनस्थ को निर्मल बना दिया उनके दुर्गो को भूमिसात कर दिया जिनमे कासली और छापोली गढ़ प्रमुख थे | इन गढ़ों के भूमिसात होते ही मीणा इतिहास के ऐतिहासिक साक्ष्य भी नष्ट हो गए | ये छोटे छोटे आटविक राज्य थे |


महाभारत के काल का मत्स्य संघ की प्रशासनिक व्यवस्था लौकतान्त्रिक थी जो मौर्यकाल में छिन्न- भिन्न हो गयी और इनके छोटे-छोटे गण ही आटविक (मेवासा ) राज्य बन गये । चन्द्रगुप्त मोर्य के पिता इनमे से ही थे । समुद्रगुप्त की इलाहाबाद की प्रशस्ति मे आटविक (आदिवासी मेवासे ) को विजित करने का उल्लेख मिलता है राजस्थान व गुजरात के आटविक राज्य मीना और भीलो के ही थे इस प्रकार वर्तमान ढूंढाड़ प्रदेश के मीना राज्य इसी प्रकार के विकसित आटविक राज्य थे।


खैराड़ प्रदेश


राजस्थान का इतिहास गौरवशाली रहा उसमे आदिवासी सर्वोपरि है । यहाँ के प्रकृति पुत्र आदिवासी इस धरा पर आदिमकाल से ही रहते आये है उनमे प्रमुख मीणा और भील है । यह प्रदेश कई उप क्षेत्रो मे विभिक्त था - मेवाड़,मारवाड़,मेरवाड़ा,ठढूढाड़, हाड़ोती और खेराड़ । उनमे अपनी वीरता के लिए खैराड़ का विशेष महत्व है । खैर वृक्ष की बहुलता के कारण इस क्षेत्र का नाम खैराड़ बताया जाता है । भाषाविज्ञान के अनुसार खैर+राष्ट्र= खैराष्ट्र=खैराट अन्त मे ‘ट ‘का स्थान ‘ड़’ के लेने के बाद नामाकरण " खैराड़" हुआ मीणा आदिवासियो की बहुलता के कारण इस प्रदेश को " मीणा खैराड़ " भी कहा जाने लगा बनास नदी के दोनों ओर के प्रदेश को खैराड़ प्रदेश कहा जाता है जिसके अन्तर्गत - प्रमुख गाँव लुहारी कला, उमर गाँव,सरस्या,गाड़ोली,ईटूड़ा, देवा खेड़ा, बासनी,टिकड़,गौमरगढ़,हिण्डोली, देवली का कुछ क्षेत्र,माण्डलगढ़ और जहाजपुर के आस पास का क्षेत्र आता है अर्सकीन के अनुसार आदिवासियो के दो प्रमुख क्षेत्र है- एक तो छप्पन के पहाड़ और दूसरे खैराड़ का क्षेत्र यहाँ के निवासियोँ को कर्नल टॉड ने इन्हे " सच्चे प्रकृति पुत्र" कहा है व सम्मान देने वालो को सम्मान देने की प्रबल भावना यहाँ की धरोहर कहा है वीरता व शौर्य वहाँ के आदिवासियो की रग रग मे बसी उनकी धरोहर है । पहाड़ी और अनपजाऊ होने कारण ये पूर्णतः आयुध्दजीवी थे युध्द ही इनकी आजिविका का साधन रहा है यह विभिन्न प्रतेशो से आये आदिवासियो का संगम स्थल है वीर विनोद के लेखक श्यामल दास के अनुसार मेवाड़ के जहाजपुर इलाके (खैराड़) मेँ मोठीस तथा पड़िहार मीणाओ की बहुलता है मीणो के 12 मेवासियो मे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोंझों खोखर का विशेष नाम है । मध्यकाल मे बनास नदी के दोनो ओर बसे खैराड़ प्रदेश में " बरड़" गोत्रिय मीणा आदिवासियो का राज्य था जिसकी राजधानी गोमरगढ़ थी इस राज्य को महाराणा प्रताप के भाई जगमाल जो अकबर की सेवा मे चला गया था जहाजपुर परगना जागीर मे मिलने पर छीना यह 1584 के आस पास की घटना है माधजी सिन्धिया के जहाजपुर क्षेत्र मे आने पर की सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । अंग्रेजो व रियासती शासको के दमन व अधिकारो मे की कटौती को लेकर भुवाना पटैल व गोकुट पटेल के नेतृत्व मे 1855 मे मीणाओने विद्रो किया |वीर विनोद मे उल्लेख करते हुए श्यामलदास ने लिखा है कि खैराड़ के मीणा बहुत बहादूर होते थे और लड़ाई के समय भीलोँ की तरह डू डू डू डू करके डूडकारी करते है तथा ये अपने पूर्वज 'माला' जुझार की सौगन्ध खाते है 1891 मे मेवाड़ मे मीणो की संख्या 20032 है " | मेवाड़ महाराणा राजसिह के समय ई 1662 मेँ खेराड (भीलवाड़ा) के मीणो ने विद्रोह किया उनको दबाया समझौते मे 1667 मेँ मीणो के सरदार पीथा को जाड़ोली(जाजपुर ) की स्वतंत्र जागीर दी गई ताकि मीणा शान्त हो जाए और शासन पर आस्था उत्पन्न हो सके । ये सब घटनाए साबित करती है कि राजस्थान के आदिवासियो ने निरन्तर स्वतंत्रता युध्द जारी रखा है चाहे सत्ता कोई भी हो क्योकि वो जानते है कि हमारे पुरखे इस धरा के मालिक और मूलनिवास है |.... year 1809 में महादजी सिंधिया की मराठा का नेत्रित्व कर रहे Mr. brrautan ने अपने पत्रों में आदिवासी मीणा का उअल्लेख करते हुए लिखा है की -खैराड़ प्रदेश जहाजगढ़ (जहाजपुर ) के मीणा सेनिको का दस्ता मराठा केम्प में आया .हुवा था मैंने एक सेवक भेजकर उन्हें बुलाया वे 13-14 व्यक्ति थे उन्होंने खुशनुमा मिजाजसे प्रवेश किया और मुझे अपने रीती रिवाजो अनुसार आदर दिया वे तीर- धनुष और कटर जैसे हथियार लिए थे उनकी पगड़ी काफी ऊँची बंधी हुई थी और शीर्ष पर बोझा पक्षियों के पंख लगे थे .सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । . (their turban very high ornomented on the top with bunch of feather of a species of curlew,called Bojha).......ukt chitra usi kherad (Jahajpur) ke meena sardar ka hai ...jise Mr.Brrautan ne banaya tha |उदयपुर राज्य के जहाजपुर परगने अर्थात खेराड के मीणाओ ने 1851 में अंग्रेजो की नई राजस्व व्यवथा के खिलाफ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के नेतृत्व मे विद्राह कर दिया इस क्षेत्र के मीणा राजसता से मुक्त थे केवल महाराणा मेवाड़ की प्रतिकात्मक सत्ता स्वीकार करते थे मीणा व भीलो के विद्रोह केवल अंग्रेजो के विरुद्ध ही नहीं थे बल्कि वे सम्बंदित राज्यों के भी विरुद्ध थे जिसके माध्यम से अंग्रेज अपनी नीतियों को कार्यान्वित करवा रहे थे शौषण और अवैध धन वसुली के खिलाफ मीणों ने बगावत कर दी विद्रोही मीणाओ ने न केवल राजस्व अधिकारियो व महाजनों को लुटा बल्कि अंग्रेज छावनियो को भी लुटा । उनके दमन के लिए उदयपुर से एक सेना मेहता अजित सिंह के नेत्रत्व में शाहापुरा ,बनेडा ,बिजोलिया, भेसरोड़, जहाजपुर एवं माँडलगढ़ के जागीरदारों की सेनाये साथ लेकर पहुची एजेंट टू गवर्नर जनरल इन राजपुताना के कहने पर जयपुर, टोंक, बूंदी राज्यों की सीमओं पर चोकसी बड़ा दी ताकि जहाजपुर के मीणाओ को अन्य मीणाओ की सहायता न मिले |उदयपुर की सेनाओ ने छोटी लुहारी व बड़ी लुहारी नामक गाँवो पर आक्रमण किया जो मीणा मुखियाओ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के गाँव थे सेनाओ ने दोनों ही गाँवो को नष्ट कर दिया तथा मीणे सपरिवार मनोहरगढ व देवखेडा की पहाडियों में जाकर मोर्चा लिया वहा उन्होंने रक्षात्मक स्थिति प्राप्त कर ली थी इसी बीच जयपुर ,बूंदी ,टोंक राज्यों से तमाम प्रतिबंधो के उपरांत भी लगभग 5000 मीणे जहाजपुर के मीणो की सहायतार्थ पहुच गए थे मीणाओ ने बड़ी बहादूरी से ये युध्द लड़ा अंत में रियासतो व सरकार की फौजे हारकर पीछे हट गई उनके 57 सिपाही मीणो के हाथो मारे गए .यह मीणाओ की बहुत बड़ी सफलता थी मीणा आदिवासियो मे 12 प्रसिध्द मेवासी हुए है उनमे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोझों खोखर का विशेष महत्व है यहाँ मेवास और मेवासी शब्दो का अर्थ स्पष्ट करना भी उचित होगा । मेवास- मेवास वह दुर्गम पहाड़ी, कन्दराओ के ऊपर प्रकृति के बीच बसा गढ़ होता है जहां तक पहुचना आदिवासियो के अलावा और किसी अन्य का पहचना सभ्भव नही । मेवास के अधिपति को ' मेवासी ' कहा जाता था अर्थात मेवासी ऐसे स्थान के अधिपति से है जो किसी शासक के अधीन न रह कर स्वतंत्र विचरण करता हुआ अपनी स्वतंत्र सत्ता का प्रदर्शन करता था और अपने निजी सैन्य बल से शासक माने जाने वाले लोगो को भयभीत किये रहता था । ऐसे मेवासी को वश करना अत्यन्त कठिन कार्य समझा जाता था । पीथा मीणा भी इस क्षेत्र का एक प्रसिध्द व्यक्ति था | सरस्या गाँव (जहाजपुर) के श्री राम मोठीस ने पिँजरे मेँ नाहर (शेर) को कैद कर भाट को दान दिया । 1857 की क्रांति मेँ तात्या टॉपे जब खैराड़ क्षेत्र मे आये तो यहाँ के मीणा आदिवासियो ने भरपूर सहायता की और कई युध्दो मे अंगेजो को हराया । 1851- 60 के आस पास यहाँ के मीणाओ को बड़ी संख्या मे फौज मे भर्ति किया । मेवाड़ के महाराणा के कहने पर इस क्षेत्र का बलदेवा मीणा (बलदेव सिंह) ने 3000 मीणा फौज मे भर्ति कराया जिसके बदल महाराणा ने दरबार मे बुलाकर सम्मान व इनाम के रूप मे 3000 चांदी के कलकार देने की पेशकश पर बलदेवा मीणा ने कहा कि अगर आप देना ही चाहते हो तो मेरी कौम का पुराना सम्मान "सिँह" जो छीन लिया गया वापिस लौटा दे तब महाराणा ने ऐसा आदेश प्रसारित कर दिया बलदेवा अब बलदेव सिह हो गये । फौज मे भर्ती होना इस क्षेत्र की परम्परा है भारत को स्वतंत्र करने के आश्वसन के बाद यहाँ के लोग अग्रेज फोज के रुप प्रथम व द्वितिय विश्व युध्द मे लड़ने गये बहादूरी से युध्द लड़ा अंग्रेजो को विजय दिलाई कई मीणा सरदारो को वीरता पुरस्कारो से नवाजा गया सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज मे यहाँ के कई सैनिक थे । सुभाष चन्द्र बोस के ड्राईवर भी इसी क्षेत्र के उमर गाँव के थे यहाँ के गाड़ोली,लुहारी,बासनी ओर उमर गाँव के सैकड़ो मीणा आदिवासी लोग भारतीय सेना मे है । उमर अकेले गाँव के अब 7000 लोग फौज मे भर्ति हो चुके । यहाँ के लोग प्रथम व द्वितीय विश्व मे लड़े थे 16 लोगो का रिकार्ड अब तक है जिनकी कई विधवाये अब भी जीवित है जिनको पेशन भी मिलती भारत सरकार से । यह एक मात्र गाँव है जिसमे से सर्वाधिक लोग भारतीय फौज मे है इस गाँव को तो भारतीय फौज गौद भी ले रखा है इस क्षेत्र को आदिवासियो की वीर धरा कहा जाये तो अतिश्योक्ति नही होगी

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. *मीना दर्शन* *विठ्ठलसिंग काकरवाल* *मीणा इतिहास एक परिचय* मीणा जाति मूल रूप से भारत के राजस्थान राज्य में निवास करने वाली एक जऩजाति है। मीणा जाति भारतवर्ष की प्राचीनतम पांच सबसे बडी जनजातियों में से एक मानी जाती है । *वेद पुराणों के अनुसार मीणा जाति मत्स्य(मीन) भगवान की वंशज है। पुराणों के अनुसार चैत्र शुक्ला तृतीया को कृतमाला नदी के जल से मत्स्य भगवान प्रकट हुए थे। इस दिन को मीणा समाज जहां एक ओर मत्स्य जयन्ती के रूप में मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर इसी दिन संम्पूर्ण राजस्थान में गणगौर का त्योहार बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।* मीणा जाति का गणचिह्न मीन (मछली) था। मछली को संस्कृत में मत्स्य कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति के राजाओं के हाथ में वज्र तथा ध्वजाओं में मत्स्य का चिह्न अंकित होता था, इसी कारण से प्राचीनकाल में मीणा जाति को मत्स्य माना गया। *प्राचीन ग्रंथों में मत्स्य जनपद का स्पष्ट उल्लेख है जिसकी राजधानी विराट नगर थी, जो अब जयपुर वैराठ है।* इस मस्त्य जनपद में अलवर, भरतपुर एवं जयपुर के आस-पास का क्षेत्र शामिल था। आज भी मीणा लोग इसी क्षेत्र में बहुत अधिक संख्या में रहते हैं। *मीणा जाति के भाटों(जागा) के अनुसार मीणा जाति में 12 पाल, 32 तड़ एवं 5248 गौत्र हैं।* *लालाराम मीणा न्यायधीश के अनुसार मध्य प्रदेश के भी निम्न 23 जिलो मे 35 से 40 लाख मीणा मुख्य रुप से निवास करते हैं :--मंदसौर, नीमच, श्योपुर, शिवपुरी, मुरैना, गुना, देवास, राजगढ, सीहोर, होशंगाबद, भोपाल, रायसेन, हरदा, इन्दौर, ग्वालीयर, विदिशा, हरदा, खंडवा, खरगोन, धार, राजगढ़, रतलाम, उज्जैन आदि मे मीणा जाति मुख्य रुप से निवास करती है जिन्हे मीना, मीणा, मैना, रावत, देशवाली, मारन आदि नामो से जाना जाता हे!* मूलतः *मीना एक सत्तारूढ़ [जाति] थे, और मत्स्य, यानी, राजस्थान या मत्स्य संघ के शासक थे,* लेकिन उनका पतन स्य्न्थिअन् साथ आत्मघात से शुरू हुआ और पूरा जब ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजपूतों के साथ मिलकर "आपराधिक जाति" में डाल दिया था। यह कार्रवाई, राजस्थान में राजपूत राज्य के साथ उनके गठबंधन के समर्थन में लिया गया निर्णय थी | मीणा राजा आम्बेर (जयपुर) सहित राजस्थान के प्रमुख भागों के प्रारंभिक शासक थे। पुस्तक 'संस्कृति और भारतीय जातियों की एकता "RS Mann द्वारा में कहा गया है कि मीना, राजपूतों के समान एक क्षत्रिय जाति के रूप में मानी जाती हे परंतु इतिहास में उल्लेख बहुत कम किया गया हैै। प्राचीन समय में राजस्थान मे मीना वंश के राजाओ का शासन था। मीणा राज्य मछली (राज्य) कहा जाता था। संस्कृत में मत्स्य राज्य का ऋग्वेद में उल्लेख किया गया था. बाद में भील और मीना, विदेशी लोगों से जो कि सिंध्, हेप्थलिते या अन्य मध्य एशियाई गुटों के साथ आये थे, से मिश्रित हुए। मीना मुख्य रूप से मीन भगवान और (शिव) की पुजा करते थे/हैं। *मीनाओ मे कई अन्य हिंदू जातिओं की तुलना में महिलाओं के लिए बेहतर अधिकार रहे हैं। विधवाओं और तलाकशुदा का पुनर्विवाह एक आम बात है* और इसेअच्छी तरह से अपने समाज में स्वीकार कर लिया है। इस तरह के अभ्यास वैदिक सभ्यता का हिस्सा हैं। आक्रमण के वर्षों के दौरान, और १८६८ के भयंकर अकाल में, तबाह के तनाव के तहत कै समुह बने। एक परिणाम के रूप मे भूखे परिवारों को जाति और ईमानदारी का संदेह का परित्याग करने के लिए पशु चोरी और उन्हें खाने के लिए मजबूर होना पडा।. *विषय सूची* 1 वर्ग 2 मीणा जाति के प्रमुख राज्य निम्नलिखित थे 3 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले 4 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां 5 मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर : *१-मीणा जाति प्रमुख रूप से निम्न वर्गों में बंटी हुई है..* *:-जमींदार या पुरानावासी मीणा :-* जमींदार या पुरानावासी मीणा वे हैं जो प्रायः खेती एवं पशुपालन का कार्य बर्षों से करते आ रहे हैं। ये लोग राजस्थान के सवाईमाधोपुर, करौली,दौसा व जयपुर जिले में सर्वाधिक हैं| *-:चौकीदार या नयाबासी मीणा :-* चौकीदार या नयाबासी मीणा वे मीणा हैं जो अपनी स्वछंद प्रकृति के कारण चौकीदारी का कार्य करते थे। इनके पास जमींने नहीं थीं, इस कारण जहां इच्छा हुई वहीं बस गए। उक्त कारणों से इन्हें नयाबासी भी कहा जाता है। ये लोग सीकर, झुंझुनू, एवं जयपुर जिले में सर्वाधिक संख्या में हैं। *-:प्रतिहार या पडिहार मीणा :-* इस वर्ग के मीणा टोंक, भीलवाड़ा, तथा बूंदी जिले में बहुतायत में पाये जाते हैं। प्रतिहार का शाब्दिक अर्थ उलट का प्रहार करना होता है। ये लोग छापामार युद्ध कौशल में चतुर थे इसलिये प्रतिहार कहलाये। *-:रावत मीणा :-* रावत मीणा अजमेर, मारवाड़ में निवास करते हैं। रावत एक उपाधी थी जो बहादुरी के लिये दी जाती थी! *-:भील मीणा :-* ये लोग सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं चित्तोड़गढ़ जिले में प्रमुख रूप से निवास करते हैं। *२-मीणा जाति के प्रमुख राज्य :-* खोहगंग का चांदा राजवंश, मांच का सीहरा राजवंश, गैटोर तथा झोटवाड़ा के नाढला राजवंश, आमेर का सूसावत राजवंश, नायला का राव बखो [beeko] देवड़वाल (द॓रवाल) राजवंश, नहाण का गोमलाडू राजवंश, रणथम्भौर का टाटू राजवंश, नाढ़ला का राजवंश, बूंदी का उषारा एवम् मोटिश राजवंश, मेवाड़ का मीणा राजवंश, माथासुला ओर नरेठका ब्याड्वाल झान्कड़ी अंगारी (थानागाजी) का सौगन मीना राजवंश! *प्रचीनकाल में मीणा जाति का राज्य राजस्थान में चारों ओर फ़ैला हुआ था!* *३-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख किले :-* तारागढ़ का किला बूंदी, आमागढ़ का किला, हथरोई का किला, खोह का किला, जमवारामगढ़ का किला, *४-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख बाबड़ियां:-* भुली बाबड़ी ग्राम सरजोली, मीन भग्वान राणी जी की बावड़ी बूंदी बावदी, सरिस्का, अल्वर पन्ना मीणा की बाबड़ी, आमेर खोहगंग की बाबड़ी,जयपुर मीणा राजा चन्द की आभानेरी चाँद बावड़ी *५-मीणा राजाओं द्वारा निर्मित प्रमुख मंदिर :-* दांत माता का मंदिर, जमवारामगढ़- सीहरा मीणाओं की कुल देवी, शिव मंदिर, नई का नाथ, बांसखो,जयपुर बांकी माता का मंदिर, रायसर,जयपुर-ब्याडवाल मीणाओं की कुलदेवी, बाई का मंदिर, बड़ी चौपड़, जयपुर ज्वालादेवी का मंदिर, जोबनेर, जयपुर टोडा महादेव का मंदिर, टोडामीणा, जमवारामगढ़, जयपुर सेवड माता का मंदिर, मीन भगवान का मंदिर, मलारना चौड़,सवाई माधोपुर (राजस्थान) मीन भगवान का मंदिर, चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर (राजस्थान) मीन भगवान का मंदिर, खुर्रा, लालसोट, दौसा (राजस्थान) *इतिहास प्रसिद्द पूरात्वविद स्पेन निवासी फादर हेरास ने 1940- 1957 तक सिन्धु सभ्यता पर खोज व शोद्द कार्य किया 1957 में उनके शोद्द पत्र मोहन जोदड़ो के लोग व भूमि शोद्द पत्र संख्या-4 में लिखा है* मोहन जोदड़ो सभ्यता के समय यह प्रदेश चार भागो में विभक्त था जिनमे एक प्रदेश मीनाद था जिसे संस्कृत साहित्य में मत्स्य नाम दिया गया और साथ ही यह भी लिखा की *मीना (मीणा) आर्यों और द्रविड़ो से पूर्व बसा मूल आदिवासी समुदाय था जो ऋग्वेद काल के मत्स्यो के पूर्वज है जिसका गण चिह्न मछली (मीन) था* । इस *मीना समुदाय का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है वहा लिखा है ये लोग बड़े वीर पराक्रमी और शूरवीर है* पर आर्य राजा सुदास के शत्रु है इसका ही उल्लेख डिस्ट्रिक गजेटियर बूंदी 1964 के पृष्ट -29 पर भी किया गया है; *हरमनगाइस ने अपनी पुस्तक द आर्ट एण्ड आर्चिटेक्चर ऑफ़ बीकानेर के पृष्ट -98 पर मीणा समुदाय की प्राचीनता का उल्लेख* करते हुए लिखा है की मीना आदिवासी लोग मत्स्य लोगो के वंसज है जो आर्यों की और से लडे राजा सुदास से पराजित हुए और महाभारत के युद्द में मत्स्य जनपद के शासक के रूप में शामिल हुई | महाभारत युद्द में हुई क्षति से ये बिखर गए छोटे छोटे अनेक राज्य अस्तित्व में आ गए जिनमे इनका पूर्व का कर्द राज्य गढ़ मोरा महाभारत काल में जिसका शासक ताम्र ध्वज थे *मोरी वंश प्रसिद्द हुवा जिसका राजस्थान में अंतिम शासक चित्तोड़ के मान मोर हुए* जिसे बाप्पा रावल ने मारकर गुहिलोतो का राज्य स्थापित किया जो आगे जाकर सिसोदिया कहलाया | मोरी (मोर्य) साम्राज्य के अंत और गुप्त सामराज्य के समय अनेक छोटे छोटे राज्य हो गए मेर, मेव और मीना कबीलाई मेवासो के रूप में अस्तित्व में आये .उत्तर से आने वाली आक्रमण करी जातियों ने इनको काफी क्षति पहुचाई .शेष बचे गणराज्यो को *समुद्रगुप्त ने कर्द राज्य बनाया उस समय मेरवाडा में मेर मेवाड़ में मेव और ढूढाड में मीना काबिज थे* हर्ष वर्धन के समय उसके अधीन रहे | हर्ष वर्धन के अंत के बाद पुन जोर पकड़ा | कई राज्य बने कमजोर थे उन्होंने ताकत अर्जित करी | *वरदराज विष्णु को हीदा मीणा लाया था दक्षिण से आमेर रोड पर परसराम द्वारा के पिछवाड़े की डूंगरी पर विराजमान वरदराज विष्णु की एतिहासिक मूर्ति को साहसी सैनिक हीदा मीणा दक्षिण के कांचीपुरम से लाया था।* मूर्ति लाने पर मीणा सरदार हीदा के सम्मान में सवाई जयसिंह ने रामगंज चौपड़ से सूरजपोल बाजार के परकोटे में एक छोटी मोरी का नाम हीदा की मोरी रखा। उस मोरी को तोड़ अब चौड़ा मार्ग बना दिया लेकिन लोगों के बीच यह जगह हीदा की मोरी के नाम से मशहूर है। देवर्षि श्री कृष्णभट्ट ने ईश्वर विलास महाकाव्य में लिखा है, कि *कलयुग के अंतिम अश्वमेध यज्ञ* केलिए जयपुर आए वेदज्ञाता रामचन्द्र द्रविड़, सोमयज्ञ प्रमुखा व्यास शर्मा, मैसूर के हरिकृष्ण शर्मा, यज्ञकर व गुणकर आदि विद्वानों ने महाराजा को सलाह दी थी कि कांचीपुरम में आदिकालीन विरदराज विष्णु की मूर्ति के बिना यज्ञ नहीं हो सकता हैं। यह भी कहा गया कि द्वापर में धर्मराज युधिष्ठर इन्हीं विरदराज की पूजा करते था। जयसिंह ने कांचीपुरम के राजा से इस मूर्ति को मांगा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। तब जयसिंह ने साहसी हीदा को कांचीपुरम से मूर्ति जयपुर लाने का काम सौंपा। हीदा ने कांचीपुरम में मंदिर के सेवक माधवन को विश्वास में लेकर मूर्ति लाने की योजना बना ली। कांचीपुरम में विरद विष्णु की रथयात्रा निकली तब हीदा ने सैनिकों के साथ यात्रा पर हमला बोला और विष्णु की मूर्ति जयपुर ले आया। इसके साथ आया माधवन बाद में माधवदास के नाम से मंदिर का महंत बना। अष्टधातु की बनी सवा फीट ऊंची विष्णु की मूर्ति के बाहर गण्शोमध्ययुगीन इतिहास प्राचीन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने, एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दा बच्चे, ढोलाराय को दिल्ली भेजा, मीणा राज्य का प्रतिनिधित करने के लिए। राजपूत ने इस् एहसान के लिए आभार मे *राजपूत सणयन्त्रकारिओ ने दीवाली पर पुरखो को पानी देते समय निहत्थे मीनाओ पर हमला करके मीनाओ की लाशे बिछा दि, उस समय मीना पित्र तर्पन रस्में कर रहे थे।* मीनाओ को उस् समय निहत्था होना होता था। जलाशयों को"जो मीनाऔ के मृत शरीर के साथ भर गये। ] और *इस प्रकार कछवाहा राजपूतों ने खोगओन्ग पर विजय प्राप्त की थी, सबसे कायर हर्कत और राजस्थान के इतिहास में शर्मनाक।* एम्बर के कछवाहा राजपूत शासक भारमल हमेशा नह्न मीना राज्य पर हमला करता था, लेकिन बहादुर बड़ा मीणा के खिलाफ सफल नहीं हो सका। अकबर ने राव बड़ा मीना को कहा था,अपनी बेटी कि शादी उससे करने के लिए। बाद में भारमल ने अपनी बेटी जोधा की शादी अकबर से कर दि। तब अकबर और भारमल की संयुक्त सेना ने बड़ा हमला किया और मीना राज्य को नस्त कर दिया। मीनाओ का खजाना अकबर और भारमल के बीच साझा किया गया था। भारमल ने एम्बर के पास जयगढ़ किले में खजाना रखा । *-:कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:-* कर्नल जेम्स- टॉड के अनुसार कुम्भलमेर से अजमेर तक की पर्वतीय श्रृंखला के अरावली अंश परिक्षेत्र को मेरवाड़ा कहते है । मेर+ वाड़ा अर्थात मेरों का रहने का स्थान । कतिपय इतिहासकारों की राय है कि " मेर " शब्द से मेरवाड़ा बना है । यहां यह भी सवाल खड़ा होता है कि क्या मेर ही रावत है । कई इतिहासकारो का कहना है किसी समय यहां विभिन्न समुदायो के समीकरण से बनी 'रावत' समुदाय का बाहुल्य रहा है जो आज भी है । *रावत एक उपाधी थी जो बहादुर लोगो को दी जाती थी!* कहा यह भी जाता है कि यह समुदाय परिस्थितियों और समय के थपेड़ों से संघर्ष करती कतिपय झुंझारू समुदायों से बना एक समीकरण है । *सुरेन्द्र अंचल अजमेर का मानना है कि रावत ही मीणा है या यो कह लें कि मीणाओ मे से ही रावत वर्ग है । रावत और राजपूतो में परस्पर विवाह सम्बन्ध के उदाहरण मुश्किल से हि मिल पाए । जबकि रावतों और मीणाओ के विवाह होने के अनेक उदाहरण आज भी है ।* श्री प्रकाश चन्द्र मेहता ने अपनी पुस्तक " आदिवासी संस्कृति व प्रथाएं के पृष्ठ 201 पर लिखा है कि मेवात मे मेव मीणा व मेरवाड़ा में मेर मीणाओं का वर्चस्व था। महाभारत के काल का मत्स्य संघ की प्रशासनिक व्यवस्था लौकतान्त्रिक थी जो मौर्यकाल में छिन्न- भिन्न हो गयी और इनके छोटे-छोटे गण ही आटविक (मेवासा ) राज्य बन गये । चन्द्रगुप्त मोर्य के पिता इनमे से ही थे । समुद्रगुप्त की इलाहाबाद की प्रशस्ति मे आ...टविक ( मेवासे ) को विजित करने का उल्लेख मिलता है राजस्थान व गुजरात के आटविक राज्य मीना और भीलो के ही थे इस प्रकार वर्तमान ढूंढाड़ प्रदेश के मीना राज्य इसी प्रकार के विकसित आटविक राज्य थे । वर्तमान हनुमानगढ़ के सुनाम कस्बे में मीनाओं के आबाद होने का उल्लेख आया है कि *सुल्तान मोहम्मद तुगलक ने सुनाम व समाना के विद्रोही जाट व मीनाओ के संगठन ' मण्डल ' को नष्ट करके मुखियाओ को दिल्ली ले जाकर मुसलमान बना दिया* ( E.H.I, इलियट भाग- 3, पार्ट- 1 पेज 245 ) इसी पुस्तक में अबोहर में मीनाओ के होने का उल्लेख है (पे 275 बही) इससे स्पष्ट है कि मीना प्राचीनकाल से सरस्वती के अपत्यकाओ में गंगा नगर हनुमानगढ़ एवं अबोहर- फाजिल्का मे आबाद थे । रावत एक उपाधि थी जो महान वीर योध्दाओ को मिलती थी जो सम्मान सूचक मानी जाती थी मुस्लिम आक्रमणो के समय इनमे से काफी को मुस्लिम बना...या गया अतः मेर मेरात मेहर मुसमानो मे भी है ॥ *17 जनवरी 1917 में मेरात और रावत सरदारो की राजगढ़ ( अजमेर ) में महाराजा उम्मेद सिह शाहपूरा भीलवाड़ा और श्री गोपाल सिह खरवा की सभा मेँ सभी लोगो ने मेर मेरात मेहर की जगह रावत नाम धारण किया ।* इसके प्रमाण के रूप में 1891 से 1921 तक के जनसंख्या आकड़े देखे जा सकते है 31 वर्षो मे मेरो की संख्या में 72% की कमी आई है वही रावतो की संख्या में 72% की बढोत्तर हुई है । गिरावट का कारण मेरो का रावत नाम धारण कर लेना है । सिन्धुघाटी के प्राचीनतम निवासी मीणाओ का अपनी शाखा मेर, महर के निकट सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हुए कहा जा सकता है कि -- *सौराष्ट्र (गुजरात ) के पश्चिमी काठियावाड़ के जेठवा राजवंश का राजचिन्ह मछली के तौर पर अनेक पूजा स्थल " भूमिलिका " पर आज भी देखा जा सकता है इतिहासकार जेठवा लोगो को मेर( महर, रावत) समुदाय का माना जाता है* जेठवा मेरों की एक राजवंशीय शाखा थी जिसके हाथ में राजसत्ता होती थी *(I.A 20 1886 पेज नः 361) कर्नल टॉड ने मेरों को मीना समुदाय का एक भाग माना है (AAR 1830 VOL- 1) आज भी पोरबन्दर काठियावाड़ के महर समाज के लोग उक्त प्राचीन राजवंश के वंशज मानते है अतः हो ना हो गुजरात का महर समाज भी मीणा समाज का ही हिस्सा है ।* *फादर हैरास एवं सेठना ने सुमेरियन शहरों में सभ्यता का प्रका फैलाने वाले सैन्धव प्रदेश के मीना लोगो को मानते है ।* इस प्राचीन आदिम निवासियों की सामुद्रिक दक्षता देखकर मछलि ध्वजधारी लोगों को *नवांगुतक द्रविड़ो ने मीना या मीन नाम दिया* मीलनू नाम से मेलुहा का समीकरण उचित जान पड़ता है मि *स्टीफन ने गुजरात के कच्छ के मालिया को मीनाओ से सम्बन्धीत बताया है दूसरी ओर गुजरात के महर भी वहां से सम्बन्ध जोड़ते है ।* कुछ महर समाज के लोग अपने आपको हिमालय का मूल मानते है उसका सम्बन्ध भी मीनाओ से है हिमाचल में मेन(मीना) लोगो का राज्य था । स्कन्द में शिव को मीनाओ का राजा मीनेश कहा गया है । *हैरास सिन्धुघाटी लिपी को प्रोटो द्रविड़ियन माना है उनके अनुसार भारत का नाम मौहनजोदड़ो के समय सिद था इस सिद देश के चार भाग थे जिनमें एक मीनाद अर्थात मत्स्य देश था । फाद हैरास ने एक मोहर पर मीना जाती का नाम भी खोज निकाला ।* उनके अनुसार मोहनजोदड़ो में राजतंत्र व्यवस्था थी । एक राजा का नाम " मीना " भी मुहर पर फादर हैरास द्वारा पढ़ा गया ( डॉ॰ करमाकर पेज न॰ 6) अतः कहा जा सकता है कि मीना जाति का इतिहास बहुत प्राचीन है इस विशाल समुदाय ने देश के विशाल क्षेत्र पर शासन किया और इससे कई जातियो की उत्पत्ती हुई और इस समुदाय के अनेक टूकड़े हुए जो किसी न किसी नाम से आज भी मौजुद है । आज भी 10-11 हजार मीणा लोग फौज में है *बुदी का उमर गांव पूरे देश मे एक अकेला मीणो का गांव है जिसमें 7000 की जनसंख्या मे से 2500 फौजी है* टोंक बूंन्दी जालौर सिरोही मे से मीणा लोग बड़ी संख्या मे फौज मे है। उमर गांव के लोगो ने प्रथम व द्वीतिय विश्व युध्द लड़कर शहीद हुए थे *शिवगंज के नाथा व राजा राम मीणा को उनकी वीरता पर उस समय का परमवीर चक्र जिसे विक्टोरिया चक्र कहते थे मिला था* जो उनके वंशजो के पास है । *आजादी के समय भारत में तीन मीणा बटालियने थी* पर दूर्भावनावश खत्म कर दी गई थी! *तूंगा (बस्सी) के पास जयपुर नरेश प्रतापसिंह और माधजी सिन्धिया मराठा के बीच 1787 मे जो स्मरणिय युध्द हुआ उसमें प्रमुख भूमिका मीणो की रही जिसमे मराठे इतिहास मे पहली बार जयपुर के राजाओ से प्राजित हुए थे वो भी मीणाओ के कारण* इस युध्द में राव चतुर और पेमाजी की वीरता प्रशंसनीय रही । उन्होने चार हजार मराठो को परास्त कर मीणाओ ने अपना नाम अमर कर दिया । तूँगा के पास अजित खेड़ा पर जयराम का बास के वीरो ने मराठो को हराया इसके बदले जयराम का बास की जमीन व जयपुर खजाने मे पद दिया गया । सम्माननीय वीर इमानदार कर्तव्यनिष्ठ मीणा बंधुवर, आपसे मेरा व्यक्तिगत आग्रह है कि आप समाज हित में जनजाति की लड़ाई व अशिक्षा दूर करने के लिए अभियान के तहत छात्रावासो के निर्माण कार्यो मैं सहयोग अवश्य करें, इस हेतु किसी अन्य बंधुवर का इंतजार नहीं करें, (क्योंकि कोई अन्य व्यक्ति आपसे कहेगा या आपके पास आएगा इसका इंतजार किया तो कोई भी सामाजिक कार्य नहीं हो सकता है) ! अतः आप सहयोग करें एवं अपने बंधुओं से सहयोग कराएं तो ही यह सामाजिक कार्य संभव है ! 🚨आपको ईश्वर ने किसी महान उद्देश्य से मानव जीवन देकर अन्य करोड़ो जीव-जंतुओं से श्रेष्ठ बनाकर यह अपेक्षा की है कि आप अन्य सभी के हितों की रक्षा करेंगे और मानवता अर्थात समाज सेवा को सर्वोपरि स्थान देंगे। राजस्थान के मीणा समाज में कुल मिलाकर 5248 गोत है, उनमें से कुछ गोत / surnames A Auraj औराज Aamroo आमरू B Beflawat बैफ़लावत Bagdi बागड़ी Bagodiya बागोडिया Bagranya बगरान्या Bainada बैनाडा Bakala बाकला Barwal बारवाल Bargoti बड़गोती Basanwal बासनवाल Byadwal ब्याडवाल Bhodna भोदना Bhorawat भौरावत or bhorayat भौरायत Banskhowa बांसखोवा Bhakand भाकंड Bandwal बान्डवाल Bamnawat बामनावत Bankliya बांकलिया Buriya बूरियाल Benade बेनाडे Bhabhla भाभला Bhonda भोन्डा Bohra / bahure बोहरा / बहुरे Balot बालोत Bunas बूनस Buriya बूरिया Banskho बांसखो Beelwal बीलवाल Bail बेल Bundas बूंदस Besar बेसर Bhaskar भास्कर Bhabhrya भाभर्या C cholak छोलक chedwal छेड़वाल chandwal छान्डवाल chanda चांदा chawal छावल chhanwal छानवाल channavat छन्नावत chirawat छिरावत chitach छिताच chhapola छापोला charnawat चर्नावत charawadiya चारावंड्या choriya छोरिया charawat छरावत chandwara चंन्दवारा chandadiya चंदाड्या chaudhari चौधरी chetriya चेत्रीया chorasya चोरस्या chandrawat चंन्द्रावत choolwal चुलवाल chorawat छोरावत chookleda चोकलेडा chungada चुंगडा D dagal डागल dhyawana ध्यावणा dewana देवणा devadwal देवदवाल dovwal डोबवाल domela डुमेला dewanda देवंदा dhanawat धनावत dundya दुन्ध्या dhankariya ढाकर्या dudawat दुडावत didawat दिदावत dedwal डेडवाल dakriya डाकर्या dadarwal डाडरवाल dechalwal डेचरवाल damachya दमाच्या dondaga दोन्डगा duwanya दुवाण्या dugarwal डुगरवाल donawat दोनावत dhaigal डहंगळ dechalwal डेचरवाल dhawaniya धावण्या dhurwal धुरवाल dhakal डाकल damriya दामर्या dussawat दुसावत dheerawat धिरावत dawer डावर F faneta फानेटा farwa फार्वा G gohli गोसली gomladoo गोमलाडू gothwal गोठवाल gunawat घुनावत ghusinga घुसिंगा gahlot गहलोत goliya गोलिया Golwal गोलवाल govli गवली goyali गोयली gorwad गोरवाड ghumariya घुमार्या ghusrawat घुस्रावत goththulगोठल ghodeta घोडटा gorni घोर्णी H hazari हजारी hatwal हटवाल hadchoor हाडचोर J Jundia जून्दिया jaif जैफ jhirval झिरवाल jagarwal जगरवाल jeejarh जिजर्ह joharwal जोहरवाल jharwal झारवाल jhamuhre झामूर्हे jakhiwal जखिवाल jareda जारेडा jorwad जोरवाड jorwal / jarwal जोरवाल / जारवाल jorawat जुरावत jurdiya जुर्डीया junwal / jonwal जुनवाल / जोनवाल jendera जेन्डेरा jalodiya जलोड्या jhajhra झाझरा janera जानेरा K kanwat कांवत kankas कांकस khoda खोड़ा kholwal खोलवाल kotwadya कोटवाड्या kunwaliya कुनवालिया khokaar खोक्कर kahite काहीटे khora खोरा khata खाटा kakroda काकरोडा kawadiya कवाडीया kathumariya कठूमार्या kankarwal काकरवाल kanwatiya कन्वाट्या kantiya कान्तिया kokra कोकरा kotwar कोटवार kotwadiya कोटवाड्या kotwada कोटवाडा kotwal कोटवाल kalot कलोत kumrawat कुमरावत kudaliya कुडालिया kajodiya कजोडीया katrawat कतरावत khorwal खोरवाल khani खाणी khatla खाटला kunjlot कुंजलोत kotawariya कोटवारिया kanriwal कनरीवाल kanetiya कानेटीया kuwal कुवल kiwad किवड kanet कानेत kawaliya कवाल्या khandal 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