स्वाभिमान कि लढाई

--- स्वाभिमान की लड़ाई — विठ्ठलसिंह काकरवाल की कलम से सीजफायर के मौके तो, महाराणा के द्वार भी आए थे। मुगल दरबार झुकाने को, सोने-चांदी के हार लाए थे। पर तलवारें नहीं झुकतीं, न बिकता है स्वाभिमान, हल्दीघाटी की माटी में, अब भी गूंजता है वो गान। भूखे रहे घास की रोटियाँ, पर मातृभूमि से न डिगे, आदर्शों की इस लड़ाई में, मीणा अकेले ही बहुत थे जगे। न compromise, न treaty की बात, बस सत्य और हक़ की पुकार, वो युद्ध था आत्मसम्मान का, न सत्ता का, न दरबार। झुकती है गर्दन जहाँ धन देखे, वहाँ महाराणा ने दिखाई राह, कीचड़ में कमल जैसे खिले, वीरों की ऐसी थी चाह। स्वाभिमान की आग में तपकर, जो इतिहास में अमर हो गए, वो मीणा नहीं, एक संदेश थे, जो आने वाली नस्लों को दे गए। आज भी जब वक्त पड़े, महाराणा की तरह खड़ा होना, न्याय-अन्याय के द्वार पर, स्वाभिमानी बन जिया होना। -

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