आपनी जडों की ओर लौटने का समय
---– "अपनी जड़ों की ओर लौटने का समय"
प्रस्तुति: विठ्ठलसिंह काकरवाल जी, मिना समाज संघठन महाराष्ट्र – सामाजिक कार्यकर्ता
आदरणीय मंच, समाजबंधु और मातृशक्तियाँ,
आज मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करने आया हूँ, जो सिर्फ हमारे आज से नहीं, बल्कि हमारे कल और हमारी संतानों के भविष्य से भी जुड़ा है।
भाइयों और बहनों, जातीय जनगणना का समय एक बार फिर हमारे दरवाजे पर खड़ा है। ये केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं है – ये एक सुनहरा मौका है, अपनी जड़ों से जुड़ने का, अपनी असली पहचान दर्ज कराने का, और अपने बच्चों को उनका संवैधानिक हक दिलाने का।
आप सबको पता है कि हम में से कई लोग आज भी "राजपूत परदेशी" या "भामटा" जैसे नामों से दर्ज हैं। लेकिन सच ये है कि हम सब मूल रूप से "मिना" समाज से आते हैं। हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया, बलिदान दिए, और अपनी संस्कृति को जिंदा रखा। लेकिन जब तक हम खुद अपनी पहचान को स्वीकार नहीं करेंगे, सरकार भी हमें कभी नहीं पहचान पाएगी।
महाराष्ट्र सरकार ने 1967 में "मिना" समाज को OBC की 98वीं श्रेणी में शामिल किया।
केंद्र सरकार की अनुसूचित जनजाति (ST) सूची में "मिना" पहले से शामिल हैं।
1930 की जनगणना में भी हमारे पूर्वजों ने "मिना" नाम से अपनी पहचान दर्ज कराई थी।
तो आज मैं आप सबसे हाथ जोड़कर विनती करता हूँ –
इस बार जब जनगणना हो, तो अपने नाम की प्रविष्टि अपने पैतृक गाँव में रहने वाले परिजनों के साथ कराएँ।
जाति के कॉलम में "मिना" ही लिखवाएँ।
क्योंकि अगर हम अब भी "राजपूत परदेशी" या "भामटा" जैसे शब्दों के पीछे अपनी असली पहचान छिपाते रहे,
तो सरकार हमारे बच्चों को आरक्षण नहीं देगी, छात्रवृत्ति नहीं देगी, योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा, प्रमाणपत्र नहीं मिलेगा।
यही नहीं, हमारा सामाजिक और राजनैतिक बळ भी कमजोर पड़ जाएगा।
भाइयों और बहनों, ये वक्त है जागने का, जुड़ने का और आगे बढ़ने का।
आज की सही पहचान ही कल की मजबूत पीढ़ी को जन्म देगी।
आगे आपकी मर्जी... लेकिन एक बार ज़रूर सोचिए –
क्या आप अपनी संतानों को उनका हक दिलाना चाहते हैं?
जय मिना समाज!
जय भारत!
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