श्मशान में रमण करने वाले शिव*
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*श्मशान में रमण करने वाले शिव* – एक अलौकिक दृष्टिकोण
*लेखक: विट्ठलसिंह काकरवाल* जी के कलम से साभार
भगवान शिव का निवास स्थान श्मशान क्यों है? यह प्रश्न सदियों से भक्तों के मन में कौंधता रहा है। इस रहस्य को यदि भक्ति और प्रतीक के दृष्टिकोण से समझा जाए तो उसमें छिपा है एक गहरा भाव, एक अनोखी कहानी।
माना जाता है कि एक समय की बात है – लोग दिनभर मंदिरों में बैठकर राम नाम का संकीर्तन करते थे। शिवजी को यह अत्यंत प्रिय था, वे स्वयं भी रामभक्त हैं। लेकिन रात को जब मंदिर बंद हो जाते, तब यह राम नाम का रस भी जैसे थम जाता।
एक दिन शिवजी ने देखा कि बहुत-से लोग राम नाम का उच्चारण करते हुए कहीं जा रहे हैं। वे भी उन भक्तों के पीछे-पीछे चल दिए। जिज्ञासावश पूछ बैठे – “यह कहां जा रहे हो?”
भक्तों ने उत्तर दिया – “यह शव यात्रा है, श्मशान जा रहे हैं।”
शिवजी भी उनके साथ श्मशान पहुंचे।
श्मशान में पहुंचकर देखा कि वहां तो 24 घंटे राम नाम की गूंज है – “राम नाम सत्य है”। वह नाम जो जीवन के अंत में भी सत्य रह जाता है, वही शिवजी के हृदय में गूंज उठा। उन्होंने वहीं बैठकर धूनी रमा ली। बोले – अब तो यही स्थान मेरा धाम है, अब यहीं रमण करूंगा।
तभी से शिवजी श्मशान में निवास करते हैं – जहां माया नहीं, छल नहीं, केवल सत्य है।
श्मशान वह स्थान है जहां भेदभाव, झूठ, दिखावा – सब समाप्त हो जाते हैं। वही तो है शिव का प्रिय स्थान।
यह कथा न केवल शिव की भक्ति को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि ईश्वर वहां निवास करते हैं जहां सच्चाई हो, भक्ति हो, और माया से विरक्ति हो।
*कलम साभार: विट्ठलसिंह काकरवाल जी*
मीणा समाज के वरिष्ठ चिंतक व सामाजिक कार्यकर्ता
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