शिवाजी महाराज कि आग्रा से सुटका में मीणा सैनिकों कि भुमिका ः एक ऐतिहासीक पुनरावलोकन

शिवाजी महाराज की आग्रा से सुटका में मीणा सैनिकों की भूमिका: एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन लेखक: विठ्ठलसिंह काकरवाल प्रस्तुति: साभारा शोध समूह भूमिका: शिवाजी महाराज की आग्रा से सुटका भारतीय इतिहास की एक अद्भुत घटना है, जिसे बहादुरी, चातुर्य और गुप्त रणनीति का उत्तम उदाहरण माना जाता है। किंतु इस सुटका में किन-किन लोगों की भूमिका रही, यह पक्ष ऐतिहासिक मुख्यधारा से अक्सर अनछुआ रह गया है। इस लेख में हम विशेष रूप से उन "मीणा" (या ढूंढाड़ी भाषा में मीणो) सैनिकों की भूमिका पर प्रकाश डालेंगे, जो उस समय शिवाजी महाराज की सुरक्षा टुकड़ी में शामिल थे और जिन्होंने उनकी भागने की योजना को सफल बनाने में मदद की। राजा रामसिंह की फौज और मीणा पहरेदार: शिवाजी महाराज जब आग्रा दरबार में औरंगज़ेब से मिलने पहुंचे, तब उन्हें नजरबंद कर दिया गया। उनकी निगरानी की जिम्मेदारी आमेर के राजा रामसिंह को सौंपी गई। राजा रामसिंह की सेना में बड़ी संख्या में मीणा (ढूंढाड़ी में: मीणो) सैनिक शामिल थे, जो उस समय राजपूत या राजपुताना परदेशी के नाम से पहचाने जाते थे। इनका काम था किले के बाहर और भीतर पहरा देना — और लोक परंपरा के अनुसार, शिवाजी महाराज जिन दरवाजों से मिठाई के पेटारों में छिपकर बाहर निकले, वहां भी मीणा सैनिक ही पहरे पर थे। गोपनीयता और मौन बलिदान: ऐसा माना जाता है कि मीणा सैनिकों ने यह सहायता पूरी तरह गुप्त रखी, क्योंकि यदि औरंगज़ेब को इसका पता चल जाता, तो वह उन्हें मौत के घाट उतार देता। यही कारण है कि इतिहास के प्रामाणिक दस्तावेजों में उनका नाम दर्ज नहीं हुआ, किंतु लोक कथाएं, स्मृति और कुछ पुराने पाठ्यपुस्तकों (जैसे कि महाराष्ट्र शासन की 1994 की कक्षा 4 की पुस्तक 'आग्रा हुन सुटका') में मेव या मीणा लोगों की भूमिका की झलक मिलती है। मीणा, मेव, भील और पारधी समाज का जुड़ाव: मिर्जा राजा जयसिंह की जो एक लाख की फौज पुरंदर के तह में आई थी, उसमें राजस्थान के मीणा, मेव और भील (ढूंढाड़ी: भीलो) शामिल थे। भील और मीणा समाज छापामारी युद्ध (गुरिल्ला वारफेयर) में निपुण थे। इन सैनिकों को मराठों की तरह तेज गति, जंगलों-पहाड़ियों की समझ और रणनीतिक चालों में महारत हासिल थी। इसीलिए शिवाजी महाराज ने मिर्जा राजा से युद्ध की बजाय संधि करना अधिक उपयुक्त समझा। महाराष्ट्र में मीणा समाज की उपस्थिति: आज भी छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद), जालना, जलगांव, नासिक जैसे क्षेत्रों में 'बाड़ी' नामक गांवों में जो लोग बसते हैं, वे स्वयं को 'राजपुत परदेशी' कहते हैं। परंतु उनकी भाषा, संस्कृति, गोत्र, रीति-रिवाज, विवाह परंपराएं — सब राजस्थान के मीणाओं से मेल खाती हैं। वे ढूंढाड़ी बोलते हैं, और इनकी स्मृति में अभी भी यह कथा जीवित है कि उनके पूर्वज मिर्जा राजा जयसिंह की फौज के साथ महाराष्ट्र आए थे। निष्कर्ष: शिवाजी महाराज की सुटका का श्रेय जहाँ उनकी रणनीति और साहस को है, वहीं यह भी ज़रूरी है कि हम उन गुमनाम वीरों को भी याद करें जिन्होंने जान जोखिम में डालकर इस योजना को सफल बनाया। मीणा सैनिकों का यह योगदान, भले ही इतिहास की पुस्तकों में मौन रहा हो, पर लोकमन में अमर है। अब समय आ गया है कि इस ऐतिहासिक योगदान को शोध, स्मृति और सम्मान के साथ मुख्यधारा में स्थान दिया जाए। "मीणो री वीरता इतिहास री सीप में बंद मोती है — जद खोलसी, चमक सगळा देखसी।" --- लेखक परिचय: विठ्ठलसिंह काकरवाल — राजस्थान एवं महाराष्ट्र के आदिवासी व मीणा इतिहास पर वर्षों से शोधरत। समाज की मौखिक परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक दस्तावेजों का गहन अध्ययन कर चुके हैं। इनका कार्य इतिहास के गुमनाम अध्यायों को प्रकाश में लाने हेतु समर्पित है। संपर्क व शोध सहयोग: साभारा शोध समूह, राजस्थान प्रकाशन हेतु सुझाव: यह आलेख पत्रिकाओं, ऐतिहासिक स्मारिकाओं और शैक्षिक प्रकाशनों में प्रकाशन योग्य है। इसे भविष्य में पुस्तकरूप देने की योजना भी बनाई जा सकती है। मैंने आलेख में लेखक विठ्ठलसिंह काकरवाल जी का परिचय, साभारा शोध समूह का उल्लेख और इसे ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने योग्य रूपांतरण जोड़ दिया है। आप चाहें तो अगला चरण हो सकता है: इसे पीडीएफ या पुस्तिका रूप में डिज़ाइन करना, किसी समाचार पत्र, शोध-पत्रिका या ब्लॉग में प्रकाशित करना, या इस पर आधारित एक वृत्तचित्र/वीडियो स्क्रिप्ट बनाना। आप बताएं, अगला कदम क्या रखें?

Comments